8 गोलियां खाकर भी जिंदा रहा यह हीरो: गाजी बाबा एनकाउंटर का अनसुना सच

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गाजी बाबा एनकाउंटर

2000 के दशक की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर हिंसा और आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। संसद पर हमला (2001), विधानसभा हमला (2001), और सेना मुख्यालय पर कार ब्लास्ट जैसी घटनाओं ने पूरे देश को हिला दिया था। इन सभी हमलों का मास्टरमाइंड था गाजी बाबा (असली नाम: राणा ताहिर नदीम), जिसे पकड़ने के लिए भारतीय सुरक्षा बलों ने दो साल तक जंग लड़ी।

लेकिन इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी कहानी, जो लगभग 20 साल तक छुपी रही, वह है बीएसएफ ऑफिसर नरेंद्र नाथ धर दुबे (एनएन दुबे) की। उन्होंने गाजी बाबा को मार गिराने वाली टीम का नेतृत्व किया था और इस दौरान खुद भी मौत को मात दे दी थी।


कश्मीर में आतंकवाद का दौर: सुरक्षा बलों के लिए सबसे मुश्किल समय

एनएन दुबे ने एनडीटीवी को बताया कि “2000 से 2003 तक कश्मीर में सुरक्षा बलों के लिए सबसे कठिन समय था। ये वो दौर था जब आत्मघाती हमलों की शुरुआत हुई थी। पुलिसकर्मियों और सेना के जवानों पर हमले बढ़ गए थे।”

गाजी बाबा पाकिस्तान से आया एक खतरनाक आतंकवादी था, जिसने जम्मू-कश्मीर विधानसभा हमला, संसद हमला और श्रीनगर में सेना मुख्यालय पर कार ब्लास्ट जैसे बड़े हमले किए थे। उसे पकड़ना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि वह गांदरबल, जकुरा और त्राल के पहाड़ों में छिपता था, जहां छोटी टुकड़ियों का जाना खतरे से खाली नहीं था।


ऑपरेशन: कैसे पकड़ा गया गाजी बाबा?

दिल्ली पुलिस ने संसद हमले के एक आरोपी से पूछताछ की, जिसने गाजी बाबा के एक ठिकाने के बारे में जानकारी दी। बीएसएफ ने भी जैश-ए-मोहम्मद के डिप्टी चीफ को गिरफ्तार किया, जिससे उन्हें गाजी बाबा के छिपने की जगह का पता चला।

एनएन दुबे ने बताया कि “हमने बहुत सोच-समझकर प्लान बनाया। ऑपरेशन रात के अंधेरे में किया गया ताकि गाजी बाबा को भागने का मौका न मिले। जब हमने घर में घुसने की कोशिश की, तो उसने गोलियां चलाईं और ग्रेनेड फेंके।”

गाजी बाबा एनकाउंटर

क्या हुआ था उस रात?

  • बीएसएफ की टीम ने घर के ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल को चेक किया।
  • दूसरी मंजिल पर दो अलमारियां देखकर दुबे को शक हुआ।
  • जब उन्होंने अलमारी के शीशे पर गोली मारी, तो एक छुपा हुआ दरवाजा खुला और आतंकवादियों ने फायरिंग शुरू कर दी।
  • कॉन्स्टेबल बलबीर सिंह (जो सिर्फ 20 साल के थे) ने दुबे के सामने कूदकर गोलियां खाईं और शहीद हो गए।
  • दुबे को भी 8 गोलियां लगीं, लेकिन वह बच गए।

कैसे बच गए एनएन दुबे? उनकी शर्ट ने बचाई जान!

दुबे ने बताया कि “मुझे गोलियां बाजू और पैर में लगीं, लेकिन मेरी छाती पर कोई गोली नहीं लगी। अस्पताल में जब मैं होश में आया, तो मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हुआ?”

रहस्य तब खुला जब उनकी वर्दी धोने वाले ने देखा कि उनकी शर्ट पर लगे स्टील के बैज (डीजीसीआर पिन) गोलियों की वजह से कुचले गए थे। ये बैज उनकी शर्ट पर लगे थे, जिसने गोलियों को छाती तक पहुंचने से रोक दिया। दुबे ने कहा, “ये एक भाग्यशाली बचाव था।”


शहीद बलबीर सिंह: वो जवान जिसने अपनी जान देकर ऑफिसर को बचाया

बलबीर सिंह राजस्थान के शेखावाटी इलाके के रहने वाले थे। वह सिर्फ 20 साल के थे और उनका एक साल का बच्चा था। ऑपरेशन से दो दिन पहले ही वह छुट्टी से लौटे थे और उन्होंने खुद को टीम में शामिल करने की गुजारिश की थी।

दुबे ने याद करते हुए कहा, “जब एक आतंकवादी ने मेरी तरफ गोली चलाई, तो बलबीर सिंह मेरे सामने कूद गए और गोलियां खा लीं। वह बहुत बहादुर थे।”

बलबीर सिंह को मरणोपरांत शौर्य चक्र मिला, जबकि एनएन दुबे को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।


एनएन दुबे की कहानी अब फिल्म में

इस ऑपरेशन की कहानी अब फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ में दिखाई जाएगी, जिसमें एमरान हाशमी ने एनएन दुबे का रोल निभाया है। यह फिल्म 38 साल बाद श्रीनगर में रिलीज होने वाली पहली बॉलीवुड फिल्म है।


निष्कर्ष:

गाजी बाबा को मारने का ऑपरेशन भारतीय सुरक्षा बलों की एक बड़ी सफलता थी। यह कहानी सिर्फ एक आतंकवादी के खात्मे की नहीं, बल्कि उन जवानों की भी है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी। बलबीर सिंह जैसे शहीदों और एनएन दुबे जैसे अधिकारियों की वजह से ही आज कश्मीर में शांति की उम्मीद जगी है।

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