लेखक: पंडित मुस्तफ़ा आरिफ
कुरान शरीफ से प्रेरित १०००० पदो की ईश स्तुति (हम्द) लिखने के बाद अन्तरात्मा ने प्रेरित किया, क्युं न कर्म पर आधारित विश्व का महान ग्रंथ भागवद गीता का अध्ययन किया जाए। अध्ययन के साथ श्लोको की काव्यात्मक रूपांतरण का क्रम भी शुरू हुआ। ७८६ छंद की सुगम सरल हिंदी मे रचना के साथ। कुरान शरीफ के १०००० पद को १८ अध्याय में मैंनें लिखा है।
कुरान की पहली आयात है, जो स्वामी विवेकानंद की अवधारणा से मेल खाती है, प्रशंसा करता हुं उस ईश्वर की जो अखिल ब्रह्मांड का मालिक है। जो प्राणी-मात्र में समन्वय का आधार बनाती है। कुरान निराकार ईश्वर की भक्ति यानि ‘तौहीद” का समर्थन करता है। जबकि भागवद गीता साकार और निराकार दोनो का समर्थन कर, आपको मार्ग चयन की अनुमति देता है। दोनो धर्म ग्रंथ अन्ततोगत्वा आपको परमात्मा से जोड़ते है। तरीका भले ही एक न हो मंतव्य एक है। यानी रास्ते अलग अलग है ठिकाना तो एक है मंज़िल हर एक सख्श को पाना तो एक है। भागवद गीता अध्याय ५ का श्लोक ८ इस अवधारणा की नींव है:-
विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः सम-दर्शिनः॥
विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल (श्वपाक) में भी विद्वान पुरुष समान दृष्टि रखते हैं। अर्थात्, ज्ञानी व्यक्ति सभी जीवों में एक ही आत्मा को देखते हैं और किसी में भेदभाव नहीं करते।

इस पद का हिंदी काव्यात्मक रूपांतरण मेरी द्वारा रचित ‘गीता भारती’ के अध्याय ५ के छ्द १८ में इस प्रकार है:-
तत्व ज्ञानी अपने अंतस में, माने सबको एक समान।
ब्राह्मण हो या विनम्र साधु, या फिर हो प्रकांड विद्वान।
गाय, हाथी, कुत्ता नर-भक्षी, सब उसके लिए बराबर,
समदर्शी है तत्व ज्ञानी मनुष्य, उसकी लीला है महान।
संपूर्ण जगत मे प्रचलित सारे धर्म ग्रंथो का आधार कर्म ही है, अपने अपने मतानुसार सभी या तो साकार रूप की भक्ति के समर्थक है या निराकार रूप की। भागवद ज्ञान हमें दोनो में से एक के चयन की स्वतंत्रता देता है। आईये श्लोक के आधार पर सांप्रदायिक सौहार्द और सद्भाव की विवेचना करे।
साकार गुण:-
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥
॥ अध्याय १२ श्लोक २ ॥
जो भक्त मेरे (साकार रूप) में मन लगाकर, निरंतर युक्त होकर, परम श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं, वे मुझे सबसे उत्तम योगी प्रतीत होते हैं। अर्थात्, सगुण रूप में भगवान की भक्ति श्रेष्ठ है।
गीता भारती का अध्याय १२ छंद ८
मन मुझमें रमाए, सदा मुझसे युक्त रहते जो भक्त मेरे।
श्रद्धा परम से भरपूर, उपासना करें वो सदा नित्य मेरे।
वे योगी हैं उत्तम, मेरी नजर में वो ही सर्वश्रेष्ठ कहलाते,
भक्ति के इस पंथ के पथिक, सर्वप्रिय श्रेष्ठतम भक्त मेरे।
निराकार (निर्गुण) स्वरूप की भक्ति पर श्लोक (अध्याय 12, श्लोक 3-4):
श्लोक:
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥
॥ अध्याय १२ श्लोक ३-४॥
जो भक्त अक्षर, अनिर्देश्य, अव्यक्त (निराकार) रूप की उपासना करते हैं – जो सर्वव्यापी, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव है – वे इंद्रियों को नियंत्रित कर, सभी में समान बुद्धि रखते हुए, सभी प्राणियों के हित में रत रहते हैं, और वे भी मुझे प्राप्त करते हैं। अर्थात्, निर्गुण भक्ति से भी परमात्मा की प्राप्ति होती है, यद्यपि यह कठिन है।
गीता भारती का अध्याय १२ छंद ९
किंतु निराकार तत्व के उपासक, इंद्रियां वश में कर भरसक।
निराकार कल्पना के पथिक,अव्यक्त की पूजा करते उपासक।
अकल्पनीय अपरिवर्तनीय शाश्वत, अचल सर्वव्यापी में रमाए,
लोक कल्याण में संलग्न हो, मुझसे जुड़ते जाते है आवश्यक।
४ मई २०२५ के अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवारीय संस्करण में प्रकाशित मेरे साक्षात्कार का शीर्षक था “गीता के हिंदी काव्यात्मक रूपांतरण से आस्था का समन्वय करते मुस्लिम पंडित’। सनातन और भागवद गीता के उपदेश के मद्देनजर भारतीय धार्मिक व्यवस्था में जहां मूर्तिपूजक है, वहीं निरंकार आस्था के समर्थक पंथ भी है। संक्षेप में संपूर्ण विश्व साकार और निराकार इन दोनो आस्थाओं के ईर्द-गिर्द घुमता है। मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुचे। अंत में प्रसिद्ध ऊर्दू शायर इकबाल के पंक्तियां, आपको समर्पित।
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिंदी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।।





