सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गैंगरेप में एक ने किया रेप, फिर भी सभी होंगे दोषी

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BY: Yoganand Shrivastva

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने गैंगरेप के एक अहम मामले में ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि एक व्यक्ति ने बलात्कार किया हो, लेकिन बाकी आरोपी भी घटना में समान इरादे से शामिल थे, तो सभी को समान रूप से दोषी माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मुख्य आरोपी के कृत्य के प्रमाण ही पूरे समूह को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं।

गैंगरेप के आरोपी की याचिका खारिज

यह निर्णय न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें एक आरोपी ने यह तर्क दिया था कि पीड़िता द्वारा दर्ज एफआईआर में उसका नाम नहीं लिया गया था और उसकी भूमिका महज सहयोग की थी। उसने खुद को मुख्य अपराधी नहीं माना और सजा को चुनौती दी थी।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(g) के अंतर्गत यदि अपराध सामूहिक रूप से अंजाम दिया गया है, तो यह जरूरी नहीं है कि हर आरोपी ने व्यक्तिगत रूप से बलात्कार किया हो। यदि सभी ने इस अपराध को अंजाम देने के लिए मिलकर योजना बनाई या एक समान उद्देश्य से घटना को अंजाम दिया, तो सभी को बराबर दोषी ठहराया जाएगा।

‘समान इरादे’ को माना मुख्य आधार

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गैंगरेप के मामलों में अभियोजन पक्ष को यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि हर आरोपी ने बलात्कार किया है, बल्कि यह दिखाना पर्याप्त होता है कि सभी आरोपी एकजुट होकर, समान मंशा से अपराध में शामिल थे। समान इरादे की उपस्थिति ही सजा देने के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त आधार बन सकती है।

पुराने फैसलों का हवाला

पीठ ने इस अवसर पर पूर्ववर्ती मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून की दृष्टि में यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक आरोपी की भूमिका स्पष्ट रूप से बलात्कार के रूप में साबित हो। यदि यह सिद्ध हो जाए कि वह गैंग का हिस्सा था और समान उद्देश्य से पीड़िता पर हमला हुआ, तो सभी दोषियों पर समान दंड लागू होगा।


सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यौन अपराधों से संबंधित मामलों में न्याय प्रक्रिया को सख्त बनाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि अपराध में भागीदारी का मतलब सिर्फ हाथ से करना नहीं, बल्कि सोच और मंशा से जुड़ना भी सजा के लिए पर्याप्त हो सकता है।

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