Sheopur : चंबल में जलीय जीवों के अस्तित्व पर खतरा: ‘सांड घाट’ बना अवैध रेत उत्खनन का सबसे बड़ा केंद्र, माफिया बेखौफ

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Sheopur

Sheopur : मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में चंबल नदी से होने वाला अवैध रेत परिवहन एक बड़ी चुनौती बन गया है। जिले के प्रभारी मंत्री राकेश शुक्ला द्वारा जलीय जीवों की सुरक्षा के लिए दिए गए सख्त निर्देशों का असर महज कुछ दिन ही दिखाई दिया। 40 दिनों के अंतराल के बाद अब ‘सांड घाट’ पर अवैध उत्खनन इतने बड़े स्तर पर शुरू हुआ है कि इसने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

प्रतिबंधित ‘सांड घाट’ पर मशीनों का कब्जा

Sheopur चंबल के अन्य घाटों की तुलना में सांड घाट वर्तमान में अवैध रेत मंडी का मुख्य केंद्र बन चुका है।

  • मशीनों का जाल: इस घाट पर मौजूदा समय में 4 लोडर और 10 विशेष मशीनें (चम्मच) दिन-रात चंबल का सीना चीरकर रेत निकाल रही हैं।
  • विशाल सप्लाई चेन: यहाँ से प्रतिदिन करीब 400 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से रेत की तस्करी की जा रही है। यह रेत न केवल श्योपुर, कराहल और विजयपुर बल्कि पड़ोसी राज्य राजस्थान के बारां और मंगरौली तक बेची जा रही है। माफियाओं की इस बेखौफ सक्रियता ने पुलिस और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

घड़ियाल और मगरमच्छों के प्रजनन स्थल पर संकट

Sheopur सांड घाट का भौगोलिक क्षेत्र जलीय जीवों के लिए अत्यंत संवेदनशील है। त्रिवेणी संगम के पास स्थित यह क्षेत्र टापू और विशाल रेत की चट्टानों से घिरा है।

  • प्रजनन का केंद्र: वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के बीच बने इसी टापू पर घड़ियाल और मगरमच्छ अपने अंडे देते हैं। पूर्व में विभाग यहाँ से घड़ियालों के अंडे भी सुरक्षित निकाल चुका है।
  • अस्तित्व पर हमला: माफियाओं द्वारा भारी मशीनों के उपयोग से जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। रेत की इन चट्टानों का खत्म होना सीधे तौर पर दुर्लभ घड़ियालों की संख्या में गिरावट का कारण बन सकता है।

Sheopur प्रशासन की चुप्पी और रेत माफिया का ‘सर्टिफिकेट’

Sheopur हैरानी की बात यह है कि प्रभारी मंत्री के निर्देशों के बाद कुछ समय के लिए यह घाट बंद कर दिया गया था, लेकिन अब यह फिर से पूरी क्षमता के साथ शुरू हो गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अवैध परिवहन की यह गति बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वन विभाग और पुलिस ने माफियाओं को काम करने का ‘मूक सर्टिफिकेट’ सौंप दिया है। यदि जल्द ही इस पर लगाम नहीं कसी गई, तो चंबल अभयारण्य की पहचान माने जाने वाले जलीय जीव इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे।

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