रिपोर्टर:-रंजन कुमार
Sheikhpura : ज्येष्ठ महीने की शुरुआत के साथ ही बिहार में गर्मी का सितम चरम पर है। पारा 42 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है और चिलचिलाती धूप व लू (हीटवेव) के थपेड़ों के कारण दोपहर में सड़कें सूनी नजर आ रही हैं। इस भीषण तपन में आम जनजीवन को राहत देने के लिए चौक-चौराहों पर मिलने वाला गन्ने का रस सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। लेकिन, इस ठंडे और मीठे रस के पीछे एक बेहद लंबा और चौंकाने वाला सफर छिपा है। बिहार, जो कभी गन्ना उत्पादन का गढ़ माना जाता था, आज वहां के लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए महाराष्ट्र के नासिक और पूना से आने वाले गन्ने पर निर्भर हैं।
Sheikhpura 1500 किलोमीटर दूर से ट्रकों में भरकर आ रहा है गन्ना
शेखपुरा के गन्ना गोदामों पर इन दिनों स्थानीय नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और अन्य पड़ोसी राज्यों के नंबर प्लेट वाले ट्रकों से गन्ने की अनलोडिंग हो रही है:
- लंबा सफर: स्थानीय ईख की किल्लत के चलते व्यवसाई अब नासिक, पूना, छत्तीसगढ़ और झारखंड से माल मंगा रहे हैं। नासिक से चलकर लगभग 1500 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर यह गन्ना शेखपुरा के बाजारों में पहुंच रहा है।
- बड़ी खेप: गन्ना व्यवसाई विनय कुमार के मुताबिक, गन्ने की मांग में भारी उछाल आया है। नासिक से आने वाले एक ट्रक में लगभग 15 टन गन्ना होता है, जो शहर और ग्रामीण इलाकों के खुदरा दुकानदारों के बीच महज एक दिन में ही खप जाता है। भारी मांग के चलते ट्रक चालकों को भी माल पहुंचाने में समय लग रहा है। चालक मनोहर कुमार ने बताया कि बढ़ती डिमांड के कारण माल मिलना मुश्किल हो रहा है, जिसके चलते चार दिनों के सफर के बाद एक खेप शेखपुरा पहुंच पा रही है।
Sheikhpura बिहार और नासिक के गन्ने का पूरा गणित (बाजार भाव और खासियत)
दूसरे राज्यों से आयात होने के कारण गन्ने की लागत और जूस की कीमतों पर सीधा असर पड़ा है। स्थानीय स्तर पर इसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| गन्ने का प्रकार | बाजार भाव (प्रति क्विंटल) | मुख्य विशेषताएं और अंतर |
| स्थानीय (बिहार का गन्ना) | लगभग ₹1,000 | दाम में बेहद सस्ता है, लेकिन अब बाजार में उपलब्धता न के बराबर है। |
| बाहरी (नासिक/महाराष्ट्र) | ₹1,450 से ₹1,500 | दाम में महंगा है, लेकिन यह गन्ना काफी मोटा, अत्यधिक रसीला, ज्यादा मीठा होता है और कई दिनों तक खराब नहीं होता (Long Shelf Life)। |
गन्ना रस निकालने वाले स्थानीय मजदूर नुनु लाल चौहान का कहना है कि बाहरी गन्ना महंगा जरूर पड़ता है, लेकिन इसमें रस की मात्रा और मिठास बहुत अधिक होती है, जिसके कारण ग्राहक इसी के जूस की मांग ज्यादा करते हैं।
Sheikhpura दो दशकों में उजाड़ हो गईं शेखपुरा की गन्ना बेल्ट
उपेक्षा का शिकार हुआ अतीत: एक दौर था जब शेखपुरा और शेखोंपुरसराय के इलाकों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी और यहाँ का अतीत बेहद समृद्ध था। लेकिन पिछले दो दशकों में सरकारी उदासीनता, चीनी मिलों की दुर्दशा, समय पर उचित मूल्य न मिलना और खेती में लगातार होते घाटे के कारण स्थानीय किसानों ने गन्ने से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया।
किसानों के इस पलायन का नतीजा यह हुआ कि आज स्थानीय बाजार पर नासिक के गन्ने ने पूरी तरह कब्जा कर लिया है। वर्तमान में शेखपुरा के अलावा जमुई, लखीसराय, नवादा और नालंदा जिलों में भी इसी बाहरी गन्ने से जूस का कारोबार संचालित हो रहा है।
Sheikhpura आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी पहल की जरूरत
स्थानीय जानकारों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिहार सरकार एक बार फिर इन जिलों के गन्ना उत्पादक किसानों की सुध ले, उन्हें उचित बाजार और बेहतर मूल्य की गारंटी दे, तो इस पारंपरिक खेती को दोबारा जीवित किया जा सकता है। इससे न केवल बिहार के उपभोक्ताओं को स्थानीय स्तर पर ताजा उत्पाद मिलेगा, बल्कि भारी-भरकम परिवहन खर्च बचने से किसानों की आमदनी भी दोगुनी हो सकेगी।





