हापुड़: युवक के पेट से निकले स्टील के चम्मच, टूथब्रश और पेन, डॉ. रह गए हैरान

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Hapur: 29 spoons, 19 toothbrushes, 2 pens found in young man's stomach, doctors were astonished

जानिए: युवक क्यों निगल जाता था चम्मच और टुथब्रश

रिपोर्टर: सुनील कुमार, एडिट: विजय नंदन


उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां एक युवक के पेट से 29 स्टील के चम्मच, 19 टूथब्रश और 2 पेन निकाले गए। डॉक्टरों की टीम भी ऑपरेशन के दौरान दंग रह गई।

कैसे हुई घटना

जानकारी के मुताबिक, युवक का नाम सचिन है, जो नशे का आदी था। परिजनों ने उसे नशामुक्ति केंद्र भेजा, जहां गुस्से में उसने स्टील के चम्मच, टूथब्रश और पेन निगलने शुरू कर दिए। कुछ समय बाद उसकी तबीयत गंभीर हो गई तो उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।

ऑपरेशन के दौरान चौंकाने वाला खुलासा

डॉक्टरों ने जब ऑपरेशन किया तो उनके सामने हैरान कर देने वाली तस्वीर आई। सचिन के पेट से 29 स्टील के चम्मच, 19 टूथब्रश और 2 पेन निकाले गए। फिलहाल मरीज की हालत स्थिर बताई जा रही है और उसे छुट्टी देकर घर भेज दिया गया है।

डॉक्टर का बयान

डॉ. श्याम कुमार ने बताया कि यह केस बेहद असामान्य था। ऑपरेशन सफल रहा और मरीज पूरी तरह स्वस्थ है।

मानसिक स्वास्थ्य विकार (Psychiatric Disorders)

  • ऐसे लोग अक्सर पिका (Pica) नामक विकार से ग्रस्त होते हैं।
  • इसमें व्यक्ति मिट्टी, पत्थर, चाक, धातु या अन्य गैर-खाद्य वस्तुएं खाने लगता है।
  • यह आदत किसी गहरे मानसिक तनाव, अवसाद, या न्यूरोलॉजिकल समस्या से जुड़ी हो सकती है।

2. नशे की लत और उसका असर

  • कई बार नशे की लत छोड़ने पर या नशा न मिलने पर व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है।
  • गुस्से या मानसिक असंतुलन में वह खतरनाक चीजें निगल सकता है।
  • नशा-मुक्ति केंद्रों में ऐसी घटनाएं इसलिए भी हो जाती हैं क्योंकि मरीज withdrawal symptoms से गुजर रहे होते हैं।

3. ध्यान आकर्षित करने या आत्म-क्षति (Self Harm) की प्रवृत्ति

  • कभी-कभी लोग परिवार या समाज का ध्यान पाने के लिए ऐसा करते हैं।
  • कुछ लोग गहरी हताशा या निराशा में खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।

4. समय पर मानसिक परामर्श की कमी

  • भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी जागरूकता कम है।
  • सही समय पर मनोचिकित्सक से परामर्श या थेरेपी न मिलने के कारण समस्या गंभीर हो सकती है।

क्या करना जरूरी है

  • ऐसे मामलों में सबसे पहले मनोचिकित्सक (Psychiatrist) और काउंसलिंग की मदद लेनी चाहिए।
  • परिवार को धैर्य, समझ और सहयोग देना चाहिए।
  • नशामुक्ति केंद्रों में काउंसलर और मनोवैज्ञानिक की नियमित निगरानी ज़रूरी है।