सड़क हादसों में मुआवजा पाने से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने दो बेहद अहम फैसले सुनाए हैं, जो देशभर के लाखों लोगों के लिए नजीर बन सकते हैं। इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि:
✔ अगर किसी की लापरवाही से खुद की जान जाती है, तो बीमा कंपनी पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी नहीं होगी।
✔ वहीं, मृतक के शादीशुदा बेटे-बेटियां भी अब मुआवजा पाने के हकदार होंगे, चाहे वे आर्थिक रूप से मृतक पर निर्भर थे या नहीं।
आइए जानते हैं दोनों फैसलों को विस्तार से।
पहला बड़ा फैसला: लापरवाही से हुई मौत पर बीमा कंपनी मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं
इस फैसले का सीधा संबंध उन मामलों से है, जहां ड्राइवर की लापरवाही से खुद उसकी जान चली जाती है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे, ने साफ कहा कि:
👉 अगर किसी व्यक्ति ने खुद की गलती से एक्सीडेंट किया है और उसकी मौत हुई है, तो उसके परिजनों को बीमा कंपनी से मुआवजा नहीं मिलेगा।
👉 जब हादसे में कोई बाहरी वजह न हो और पूरी गलती मृतक की ही हो, तब बीमा कंपनी पर कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनती।
कर्नाटक के रविश केस का उदाहरण
18 जून 2014 को कर्नाटक निवासी एन.एस. रविश अपने परिवार के साथ कार में यात्रा कर रहे थे। तेज और लापरवाह ड्राइविंग के चलते कार पलट गई और रविश की मौके पर ही मौत हो गई। उनके परिजनों ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से 80 लाख रुपये मुआवजे की मांग की, लेकिन:
✔ पुलिस चार्जशीट में हादसे की पूरी गलती रविश की बताई गई।
✔ मोटर एक्सीडेंट ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट, दोनों ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया।
✔ सुप्रीम कोर्ट ने भी बीमा कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजा देने से मना कर दिया।
दूसरा बड़ा फैसला: शादीशुदा बेटे-बेटियों को भी मिलेगा मुआवजा
इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर सड़क हादसे में किसी व्यक्ति की मौत होती है, तो उसके विवाहित बेटे-बेटियों को भी मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा मिलेगा, चाहे वे मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर थे या नहीं।
निरंजन दास केस से जुड़ा मामला
12 अक्टूबर 2010 को हुए इस मामले में 64 वर्षीय निरंजन दास की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। वे अपने दोस्त के साथ कार में जा रहे थे, तभी एक ट्रेलर ने उनकी कार को टक्कर मार दी। हादसे के बाद:
✔ ट्रेलर ड्राइवर के खिलाफ धारा 279 और 304ए के तहत केस दर्ज हुआ।
✔ निरंजन दास के दो शादीशुदा बेटे और अविवाहित बेटी ने 5 करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा।
✔ सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए कि दोनों बेटे और अविवाहित बेटी को मुआवजा दिया जाए।
✔ बीमा कंपनी को आदेश दिया गया कि वह एक महीने के भीतर बच्चों के बैंक खातों में मुआवजा ट्रांसफर करे।
आम जनता के लिए क्या मायने हैं ये फैसले?
इन फैसलों के बाद कई बातें स्पष्ट हो गई हैं, जो सड़क हादसों और इंश्योरेंस क्लेम से जुड़े हर व्यक्ति को जानना जरूरी है:
✅ अगर किसी की लापरवाही से उसकी खुद की मौत होती है, तो परिवार मुआवजा पाने का दावा नहीं कर सकता।
✅ मृतक के शादीशुदा बेटे-बेटियों को भी अब कानूनी तौर पर मुआवजा पाने का अधिकार है।
✅ मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 166 के तहत मुआवजा मांगने के लिए आर्थिक निर्भरता जरूरी नहीं।
मुआवजे से जुड़े नियम जानना क्यों जरूरी है?
भारत में सड़क हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में लोगों को अपने अधिकारों और नियमों की पूरी जानकारी होना जरूरी है ताकि:
✔ गलतफहमी से कानूनी पचड़े में न फंसें।
✔ सही जानकारी के आधार पर मुआवजे का दावा कर सकें।
✔ बीमा कंपनियों के साथ किसी भी विवाद में खुद को मजबूती से पेश कर सकें।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों फैसले न सिर्फ कानून की व्याख्या करते हैं, बल्कि आम लोगों के लिए भी बड़ी राहत और स्पष्टता लेकर आए हैं। अगर आप या आपके परिवार के सदस्य सड़क हादसे में पीड़ित होते हैं, तो इन कानूनी प्रावधानों को समझना आपके हित में है।
संबंधित सवाल (FAQ)
Q. क्या हर एक्सीडेंट में बीमा कंपनी मुआवजा देती है?
अगर हादसे में मृतक की लापरवाही सामने आती है, तो बीमा कंपनी बाध्य नहीं होती। बाकी मामलों में क्लेम किया जा सकता है।
Q. क्या शादीशुदा बेटा-बेटी मुआवजा पा सकते हैं?
हां, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के अनुसार शादीशुदा बच्चे भी मुआवजा पाने के हकदार हैं।
Q. मुआवजा पाने के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत होती है?
FIR, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, बीमा पॉलिसी की कॉपी, मृतक और वारिसों के दस्तावेज जरूरी होते हैं।





