रायगढ़। रायगढ़ नगर निगम के भूतपूर्व आयुक्त प्रमोद कुमार शुक्ला के खिलाफ राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन की अनुमति दे दी है। यह स्वीकृति करीब नौ साल बाद मिली है, जब 2016 में उनके खिलाफ पहली बार आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ था।
प्रमोद शुक्ला के कार्यकाल को लेकर 2016 में ही संदेह के बादल मंडराने लगे थे। उस समय नगर निगम में हुए कुछ संदिग्ध कार्यों और फैसलों को लेकर आवाजें उठनी शुरू हो गई थीं। इसके बाद 2017 में उनके खिलाफ कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। मगर, कार्रवाई की प्रक्रिया इतनी धीमी रही कि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी पूरे आठ साल तक अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी गई।
राज्य सरकार ने अब अंततः भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई का रास्ता खोलते हुए अभियोजन को स्वीकृति प्रदान की है। यह मामला नौकरशाही में जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता पर एक बार फिर सवाल खड़ा करता है। यह भी स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति कितनी महत्वपूर्ण होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अफसरों पर कार्रवाई करने में सरकारें अक्सर हिचकिचाहट दिखाती हैं। इस प्रकरण में भी वर्षों तक फ़ाइलें दबाकर रखी गईं और अब जाकर अभियोजन की स्वीकृति सामने आई है।
रायगढ़ नगर निगम के इस चर्चित प्रकरण में अगला कदम न्यायालय की प्रक्रिया होगी, जो तय करेगा कि प्रमोद शुक्ला पर लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और उन्हें क्या सज़ा मिलती है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि न्याय में देरी, न्याय से इंकार के समान मानी जाती है।





