Report: Sanjeev kumar
Bokaro जैसे-जैसे सूरज की तपिश बोकारो को अपनी आगोश में ले रही है, शहर की सड़कों पर एक बार फिर पारंपरिक “देसी फ्रिज” यानी मिट्टी के घड़ों और सुराहियों की रौनक लौट आई है। आधुनिक युग के महँगे और बिजली से चलने वाले रेफ्रिजरेटर के दौर में भी, मिट्टी की सोंधी खुशबू वाला ठंडा पानी आज लोगों की पहली पसंद बना हुआ है। शहर के चौक-चौराहों पर सजी मिट्टी के बर्तनों की दुकानों पर ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
Bokaro सेहत और स्वाद का प्राकृतिक तालमेल
बाजार में खरीदारी कर रहे लोगों का कहना है कि घड़े का पानी केवल प्यास ही नहीं बुझाता, बल्कि सेहत के लिए भी वरदान है। विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी के बर्तनों में पानी प्राकृतिक रूप से ‘एल्कलाइन’ हो जाता है, जो शरीर के pH संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। फ्रिज के बर्फ जैसे ठंडे पानी से होने वाली गले की खराश और अन्य समस्याओं के विपरीत, घड़े का पानी शरीर को धीरे-धीरे ठंडा करता है और इसमें मौजूद प्राकृतिक मिनरल्स बरकरार रहते हैं।
Bokaro चाक पर मेहनत और संघर्ष की कहानी
मिट्टी के इन बर्तनों के पीछे चंदनकियारी जैसे ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली महिलाओं की कड़ी मेहनत छिपी है। ये महिला कारीगर महीनों पहले से चिलचिलाती धूप में मिट्टी तैयार कर उन्हें चाक पर आकार देती हैं। गाँव के बाजारों में उचित दाम न मिलने के कारण, ये महिलाएं शहर का रुख करती हैं। बोकारो के शहरी बाजारों में एक घड़ा 150 से 250 रुपये तक बिकता है, जिससे इन ग्रामीण परिवारों का साल भर का जीवनयापन होता है।
Bokaro ‘देसी फ्रिज’ से खिलखिला उठा रोजगार
आधुनिकता की दौड़ में हाशिए पर जा रहे कुम्हार समाज और महिला कारीगरों के लिए यह बढ़ती मांग संजीवनी साबित हुई है। बोकारो के चास, सेक्टर-4 और सिटी सेंटर जैसे इलाकों में सजी ये दुकानें न केवल लोगों को तपती गर्मी से निजात दिला रही हैं, बल्कि कई घरों के चूल्हे भी जला रही हैं। लोगों का पारंपरिक उपायों की ओर लौटना यह साबित करता है कि प्रकृति से जुड़ा हर विकल्प आज भी सर्वश्रेष्ठ है।
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