Modi Trump Meeting : फ्रांस में होने वाले G7 समिट के दौरान 17 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात होगी. फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के बाद राष्ट्रपति ट्रंप के साथ उनकी यह पहली आमने-सामने की मुलाकात होगी. माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील पर चल रही बातचीत बैठक का प्रमुख एजेंडा होगी….प्रधानमंत्री मोदी 16-17 जून को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के निमंत्रण पर G7 समिट में हिस्सा लेंगे. इस दौरान वह G7 देशों के नेताओं, साझेदार देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ वैश्विक साझेदारी, सतत आर्थिक विकास और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सुरक्षित उपयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे….ऐसे में बड़ा सवाल है कि ट्रेड डील का एजेंडा क्या इस मुलाकात के बाद आगे बढेगा ? उधर रूस और चाइना G7 से अब तक बाहर क्यों है ?

Modi Trump Meeting : मोदी-ट्रंप की खास मुलाकात, ट्रेड डील पर बनेगी बात ?
G-7 को लेकर चर्चा तेज है….नजर पीएम मोदी और ट्रंप की ख़ास मुलाकात पर है और उम्मीद के साथ सवाल भी है कि क्या ट्रेड डील पर यहाँ बात बन पायेगी ? व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी की माने तो… ‘भारत और अमेरिका स्वाभाविक आर्थिक साझेदार हैं. ऊर्जा, औद्योगिक उत्पादों और चुनिंदा कृषि वस्तुओं के क्षेत्र में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं….प्रधानमंत्री मोदी G7 समिट के बाद 18 जून को पेरिस जाएंगे, जहां वह अतिरिक्त द्विपक्षीय बैठकों में हिस्सा लेने के साथ यूरोप के सबसे बड़े टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप कार्यक्रम ‘VivaTech Summit’ में भी शामिल होंगे… दोनों नेताओं की मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब ईरान युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर भारत पर भी पड़ रहा है. हाल के दिनों में ओमान तट के पास भारतीय नाविकों को ले जा रहे तेल टैंकरों पर अमेरिकी हमलों के कारण दोनों देशों के संबंधों में तनाव देखने को मिला है.

Modi Trump Meeting : इस साल G7 सम्मेलन की मुख्य बिन्दुओं पर नजर डाले तो.
G7 सम्मेलन की मुख्य बिंदु
• G7 का सदस्य न होने के बावजूद भारत को लगातार मंचों पर आमंत्रित किया जाना
• बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत के कूटनीतिक-आर्थिक महत्व को दर्शाता है
• रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संकट को खत्म करने की दिशा में यूरोपीय देशों
• अमेरिका (US) के बीच अहम कूटनीतिक चर्चाएं इस शिखर सम्मेलन का मुख्य केंद्र हैं
• सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के भविष्य उसके नियमन
• संतुलित आर्थिक विकास को लेकर रूपरेखा तैयार की जा रही है
जी7 का पूरा नाम ‘ग्रुप ऑफ सेवन’ है, जो असल में दुनिया की सात सबसे ज्यादा विकसित और बड़ी औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं का एक बेहद प्रभावशाली अनौपचारिक संगठन है. इस खास समूह के भीतर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा जैसे बेहद ताकतवर देश शामिल हैं. इस महत्वपूर्ण संगठन की शुरुआत साल 1975 में हुई थी, जब पूरी दुनिया भयानक तेल संकट, बेकाबू महंगाई और गंभीर आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही थी. उस मुश्किल दौर में वैश्विक संकटों का हल निकालने के लिए फ्रांस ने एक बड़ी पहल की थी. फ्रांस के बुलावे पर ही अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली और जापान के शीर्ष नेताओं ने मिलकर पहली बैठक की थी, जिसके बाद अगले ही साल यानी 1976 में कनाडा को भी इस समूह का हिस्सा बनाया गया और इस तरह जी7 का

Modi Trump Meeting : भारत को निमंत्रण, क्या बदलेंगे वैश्विक समीकरण ?
मौजूदा स्वरूप पूरी दुनिया के सामने आया,,,शुरुआती दौर में इस बेहद शक्तिशाली समूह को बनाने का एकमात्र मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में लगातार उभर रही आर्थिक चुनौतियों पर मिलकर मंथन करना और उनसे निपटने के लिए एक मजबूत साझा प्लान तैयार करना था. समय बदलने के साथ-साथ इस संगठन की सोच और इसके काम करने के तौर-तरीकों में भी बहुत बड़ा बदलाव आया है. आज के समय में इस ग्रुप के मुख्य एजेंडे में केवल आर्थिक मुद्दे ही शामिल नहीं हैं, बल्कि अब इसमें पर्यावरण को बचाने के लिए जलवायु परिवर्तन, दुनिया की सुरक्षा, ऊर्जा संकट, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, तकनीकी विकास और दुनिया भर के बेहद संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे भी बहुत प्रमुखता से शामिल हो चुके हैं. इस मंच पर होने वाले फैसले पूरी दुनिया की नीतियों को बदलने की ताकत रखते हैं….
जी 7 की सालाना बैठकों में जो भी बड़े और कड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, उनका सीधा और बहुत बड़ा असर वैश्विक बाजारों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों और विभिन्न देशों के आपसी संबंधों पर साफ दिखाई देता है… इस प्रभावशाली समूह के इतिहास में एक ऐसा दिलचस्प समय भी आया था जब महाशक्ति रूस भी आधिकारिक रूप से इस खास क्लब का हिस्सा बन गया था. जिसके बाद इस संगठन का नाम बदलकर जी7 से जी8 हो गया था. हालांकि रूस का इस ग्रुप के साथ यह सफर बहुत ज्यादा लंबा नहीं चल सका. साल 2014 में जब रूस ने अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक पर रखकर क्रीमिया पर अपना सैन्य कब्जा कर लिया, तो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोप के दूसरे तमाम पश्चिमी देश रूस के इस कदम के पूरी तरह खिलाफ खड़े हो गए…
पश्चिमी देशों ने रूस पर खुले तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और दूसरे देश की संप्रभुता का उल्लंघन करने के बेहद गंभीर आरोप लगाए थे. इन बड़े विवादों के चलते ही रूस को इस समूह से हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था… रूस के बाहर होने के बाद से यह संगठन एक बार फिर से अपने पुराने नाम यानी जी7 के रूप में ही काम कर रहा है… हालांकि रूस को इस समूह में दोबारा शामिल करने की मांग कई मौकों पर अलग-अलग देशों द्वारा उठती रही है, लेकिन वर्तमान में चल रहे यूक्रेन युद्ध के बाद इस बात की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है….
Modi Trump Meeting : क्या भारतीय नाविकों का मुद्दा भी होगा चर्चा में शामिल ?
अब सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति होने के बावजूद चीन आखिर इस बेहद खास समूह का सदस्य क्यों नहीं है…इस बात पर जी7 के सभी सदस्य देश हमेशा से यह दावा करते आए हैं कि उनका संगठन कोई ऐसा मंच नहीं है जहां किसी देश को सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था के बड़े आकार या उसकी जीडीपी को देखकर सदस्यता दे दी जाए…यह संगठन मूल रूप से दुनिया के उन चुनिंदा देशों का समूह है जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास रखते हैं और जिनकी अर्थव्यवस्थाएं आधुनिक रूप से विकसित हैं…
1970 के दशक में इस संगठन की स्थापना की गई थी, उस समय चीन की आर्थिक स्थिति आज जैसी मजबूत और विशाल बिल्कुल भी नहीं थी. बाद के सालों में चीन ने आर्थिक मोर्चे पर बहुत तेजी से प्रगति की और वह एक ग्लोबल महाशक्ति बनकर जरूर उभरा, लेकिन वह आज भी लोकतंत्र की बुनियादी राह से कोसों दूर खड़ा है. इसके अलावा चीन और जी 7 के सदस्य देशों के बीच मानवाधिकारों के हनन, दक्षिण चीन सागर में अवैध सैन्य विस्तार, ताइवान का पुराना विवाद, वैश्विक व्यापार के कड़े नियम और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे कई बेहद संवेदनशील विषयों पर बहुत गहरे मतभेद हैं. यही मुख्य कारण है कि चीन इस लोकतांत्रिक समूह का हिस्सा नहीं है…
बहरहाल G7 की मजबूत कार्यप्रणाली बताती है कि भारत का यहाँ होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है…यदि इस मंच के माध्यम से पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाक़ात ट्रेड डील पर सकारात्मक रिजल्ट लाती है…तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि होगी | ऐसे में सबकी नजर पीएम मोदी ट्रंप की ख़ास मुलाक़ात पर है और सवाल है कि क्या यहाँ बनेगी बात ?

