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Bokaro: संकट मोचन पहलवान अखाड़ा में गूंजा सुंदरकांड, परंपरा और पौरुष का अनूठा संगम

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Bokaro

Report: Sanjeev kumar

Bokaro के सिटी पार्क स्थित संकट मोचन पहलवान अखाड़ा में रामनवमी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विशेष रूप से सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। यह अखाड़ा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि युवाओं के लिए अनुशासन और शारीरिक सौष्ठव का प्रतीक भी बन चुका है।

Bokaro 1976 से जारी है गौरवशाली इतिहास

इस ऐतिहासिक अखाड़े की नींव पटना के रहने वाले भूतपूर्व सैनिक जगनारायण पहलवान ने रखी थी। अखाड़े से लंबे समय से जुड़े जानकी राय बताते हैं कि 1976 में इस स्थान का विस्तार शुरू हुआ। वे स्वयं 1979 से यहाँ निरंतर अपनी सेवा दे रहे हैं। समय के साथ बजरंगबली की कृपा से यहाँ न केवल भव्य मंदिर का निर्माण हुआ, बल्कि यह क्षेत्र की पहचान बन गया।

Bokaro पुलिस और सेना को दिए कई ‘लाल’

यह अखाड़ा अपनी एक खास उपलब्धि के लिए प्रसिद्ध है—यहाँ से प्रशिक्षित हुए कई पहलवान आज भारतीय पैरामिलिट्री फोर्स और विभिन्न राज्यों की पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बजरंगबली के चरणों में मिट्टी से जुड़कर यहाँ के युवाओं ने न केवल कुश्ती के दांव-पेच सीखे, बल्कि देश सेवा का जज्बा भी हासिल किया। आज भी यहाँ बड़ी संख्या में बच्चे पहलवानी के गुर सीखकर अपना भविष्य संवार रहे हैं।

Bokaro अनूठी परंपरा: अखाड़े की सीमा में ही रहता है ध्वज

यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा इसे अन्य अखाड़ों से अलग बनाती है। रामनवमी के दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर का ध्वज बदला जाता है, लेकिन यह ध्वज अखाड़े की सीमा से बाहर नहीं ले जाया जाता। पूजा के समापन पर यहाँ कुश्ती और पहलवानी के मुकाबलों का आयोजन होता है, जो शारीरिक शक्ति और भक्ति के मेल को दर्शाता है।

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