Madhya Pradesh मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव गुरुवार को राजस्थान की धार्मिक नगरी भीलवाड़ा पहुँचे। यहाँ उन्होंने हरिशेवा उदासीन आश्रम में आयोजित ‘सनातन मंगल महोत्सव, संत समागम एवं दीक्षा महोत्सव’ में शिरकत की। राजा भलराज भील की इस ऐतिहासिक नगरी में मुख्यमंत्री ने स्वामी हंसरामजी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया और भारतीय संस्कृति के वैश्विक मूल्यों पर अपने विचार साझा किए।
भारतीय संस्कृति का प्राण है ‘सेवा’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’
Madhya Pradesh संत समागम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण की कामना करती है।
- विश्व बंधुत्व: हमारी संस्कृति का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ है, जो हमें पूरी सृष्टि को अपना परिवार मानने की प्रेरणा देता है।
- सेवा धर्म: डॉ. यादव ने जोर देकर कहा कि जीवमात्र की सेवा ही वास्तव में श्रीहरि की सेवा है। पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के संरक्षण के बिना मानवता का कल्याण संभव नहीं है।
- सांस्कृतिक जुड़ाव: मुख्यमंत्री ने एक दिलचस्प व्याख्या करते हुए कहा कि ‘रा’ से राजस्थान और ‘म’ से मध्यप्रदेश मिलकर ‘राम’ नाम की महिमा को चरितार्थ कर रहे हैं।
Madhya Pradesh तीर्थ स्थलों का विकास: राम पथ और कृष्ण पाथेय
Madhya Pradesh मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि मध्यप्रदेश सरकार उन सभी स्थानों को तीर्थ स्थल के रूप में विकसित कर रही है, जहाँ भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरण पड़े थे।
- धार्मिक पथ: सरकार द्वारा ‘श्रीरामचन्द्र गमन पथ’ और ‘श्री कृष्ण पाथेय’ तैयार किया जा रहा है, ताकि भावी पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास से जुड़ सके।
- संस्कार और शिक्षा: डॉ. यादव ने अभिभावकों से आह्वान किया कि वे बच्चों को वेद-पुराण पढ़ाएं और उन्हें संस्कारवान बनाएं। उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन पद्धति है।
सिंहस्थ 2028 के लिए संतों को आमंत्रण
Madhya Pradesh संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ने उज्जैन (अवंतिका) की पावन धरती और आगामी सिंहस्थ महाकुंभ 2028 का विशेष उल्लेख किया।
- अमृत का आशीष: डॉ. यादव ने बताया कि जब बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब उज्जैन में सिंहस्थ का भव्य आयोजन होता है। उन्होंने देश-विदेश से आए सभी साधु-संतों को 2028 में उज्जैन आने का निमंत्रण दिया।
- दीक्षा महोत्सव: कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने तीन युवा संतों—श्री ईशानराम जी, श्री केशवराम जी और श्री सुमज्ञराम जी महाराज को संन्यास की दीक्षा मिलने पर उनका अभिनंदन किया और गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता बताई।





