वंदे मातरम् बहस से हिला संसद का शीतकालीन सत्र: पीएम मोदी का कांग्रेस पर हमला, विपक्ष ने भी किया पलटवार

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by: vijay nandan

नई दिल्ली: संसद का शीतकालीन सत्र इस बार पूरी तरह वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ की बहस से गर्माया हुआ है। सोमवार को लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष चर्चा की शुरुआत की, जबकि मंगलवार को इसी मुद्दे पर राज्यसभा में 10 घंटे की लंबी बहस होगी, जिसका नेतृत्व गृह मंत्री अमित शाह करेंगे। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना और 1950 में राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त वंदे मातरम् आजादी आंदोलन की धड़कन माना जाता है, और अब फिर से भारतीय राजनीति के केंद्र में है।

पीएम मोदी का जोर: वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, राष्ट्र चेतना का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि वंदे मातरम् ने गुलामी और दमन के दौर में भारतीय समाज को शक्ति, साहस और आत्मसम्मान की नई ऊर्जा दी। उन्होंने बताया कि 1857 के विद्रोह के बाद जब अंग्रेज शासन ‘गॉड सेव द क्वीन’ को भारत की जनता पर थोपना चाहता था, तब बंकिमचंद्र ने वंदे मातरम् के जरिए इसका सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतिरोध किया।

पीएम मोदी ने कहा कि यह गीत वैदिक परंपरा की उस सोच का विस्तार है, जिसमें धरती को माता और नागरिक को उसकी संतान माना जाता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बंगाल की बौद्धिक चेतना से घबराकर ब्रिटिश शासन ने इसी क्षेत्र को सबसे पहले विभाजित करने की कोशिश की, लेकिन वंदे मातरम् ने उस समय भी एकता का प्रतीक बनकर समाज को जोड़ने का काम किया।

कांग्रेस पर तीखे हमले और ऐतिहासिक फैसलों पर सवाल

पीएम मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस के ऐतिहासिक रुख को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू ने आनंदमठ की पृष्ठभूमि से जुड़े विवादों का हवाला देते हुए गीत के उपयोग को सीमित करने की बात कही, जिसके बाद 1937 में वंदे मातरम् के कई पदों को अलग कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने इसे “विभाजनकारी सोच” का परिणाम बताया और कहा कि यह फैसला मुस्लिम लीग के दबाव में लिया गया था।

पीएम मोदी के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने वंदे मातरम् के गाए जाने पर प्रतिबंध लगाए थे क्योंकि इसकी शक्ति जनता को एकजुट कर रही थी लेकिन स्वतंत्र भारत में ही इसे टुकड़ों में बांट दिया गया।

कांग्रेस का पलटवार: “राजनीतिक रंग देकर इतिहास को तोड़ने की कोशिश”

कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने पीएम मोदी के भाषण को पूरी तरह राजनीतिक बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री हर मुद्दे को नेहरू के इर्द-गिर्द ले आते हैं। उन्होंने दावा किया कि टैगोर स्वयं केवल पहले दो पदों के उपयोग के पक्ष में थे और नेहरू ने यह निर्णय सामाजिक सौहार्द और जटिल भाषा वाले हिस्सों को ध्यान में रखते हुए लिया था, न कि किसी दबाव में।

गोगोई ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री इतिहास को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं और बार-बार नेहरू को निशाना बनाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं।

विपक्ष के अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया

सपा अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने कहा कि जिस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन को जोड़ा, आज वही गीत कुछ लोगों की विभाजनकारी राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है। उनका कहना था “वंदे मातरम् गाने का नहीं, निभाने का मंत्र है।

संसद पहुंचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पत्रकारों के सवालों पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया और केवल इतना कहा, प्रियंका का भाषण सुनिए।

वंदे मातरम् पर बहस क्यों?

विशेष सत्र में लगातार हो रही राजनीतिक तल्खी यह दिखाती है कि वंदे मातरम् अब केवल सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि ऐतिहासिक निर्णयों और विचारधाराओं की लड़ाई का प्रमुख केंद्र बन चुका है। सरकार का दावा है कि राष्ट्रगीत की 150वीं वर्षगांठ पर “अनजाने पहलुओं” को सामने लाया जाना जरूरी है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा और ध्यान भटकाने की रणनीति बता रहा है।

एक ओर यह बहस इतिहास की परतों को खोलने का अवसर है, वहीं दूसरी ओर यह मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण की झलक भी प्रस्तुत करती है, जहां एक गीत, जिसने कभी पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट किया, आज राजनीतिक विमर्श का विषय बन गया है।

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