Hasya Hathauda : शादी का खाना, रिश्तेदारों का गाल बजाना, हाथ में प्लेट नुक्स अनेक

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भैया, हमारे देश में शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं होती, यह रिश्तेदारों का “महासम्मेलन” होती है, जहां हर किसी के पास अपना-अपना एजेंडा होता है। और इस महासम्मेलन का सबसे बड़ा रणक्षेत्र होता है, खाने का पंडाल।

जैसे ही बैंड बाजा “तन तना तन” बजाता है, वैसे ही चाचा, ताऊ, मौसी, बुआ सबके कदम डांस फ्लोर से ज्यादा तेजी से खाने की ओर बढ़ते हैं। यहां डांस कम और “डिश सर्वे” ज्यादा होता है। सबसे पहले एक अनुभवी रिश्तेदार प्लेट लेकर पूरे पंडाल का चक्कर लगाता है, मानो कोई फूड इंस्पेक्टर हो “कितने काउंटर हैं? पनीर कौन सा है? मिठाई में क्या है? और सबसे जरूरी, गोलगप्पे हैं या नहीं?

Hasya Hathauda ShadiKaKhana : अब शुरू होती है असली राजनीति।

एक तरफ मामा जी हैं, जो प्लेट में हर चीज़ थोड़ी-थोड़ी लेकर कहते हैं, बस टेस्ट कर रहे हैं और दूसरी तरफ फूफा जी हैं, जिनकी प्लेट देखकर लगता है कि वे कैटरर का स्टॉक खत्म करने का ठेका लेकर आए हैं।

इसी बीच एक चाची जी धीरे से फुसफुसाती हैं देखो-देखो, लड़के वालों के लिए स्पेशल काउंटर है… हमारे लिए तो बस यही सब! बस फिर क्या, शादी में अचानक “खानपान असमानता आंदोलन” शुरू हो जाता है।

Hasya Hathauda ShadiKaKhana : रिश्तेदारों की राजनीति का दूसरा चरण शुरू होता है तुलना।

पिछली बार शर्मा जी की शादी में 12 तरह की मिठाई थी… यहां तो सिर्फ 6 ही हैं! और पनीर भी देखो, उतना सॉफ्ट नहीं है… लगता है बजट कम पड़ गया!

अब आते हैं वे रिश्तेदार जो खाने से ज्यादा “कमेंट्री” में विश्वास रखते हैं। प्लेट हाथ में लेकर खड़े-खड़े हर डिश का रिव्यू देंगे
“सूप थोड़ा ठंडा है… सलाद में नमक कम है… और ये गुलाब जामुन? भाई, दिल नहीं भरा!”

उधर बच्चे अपनी अलग ही राजनीति खेल रहे होते हैं। उन्हें न रिश्तेदारी से मतलब, न परंपरा से। उनका एजेंडा साफ है “पहले आइसक्रीम, फिर बाकी सब।” और अगर आइसक्रीम मशीन बंद हो गई, तो समझ लीजिए शादी में इमरजेंसी लग गई।

अब बात करते हैं उस खास रिश्तेदार की, जो हर शादी में होता है, “फ्री पैकिंग विशेषज्ञ।” ये लोग नैपकिन में समोसे, मिठाई, कचौरी ऐसे पैक करते हैं जैसे कल से दुनिया में खाना मिलना बंद हो जाएगा। और जाते-जाते कहते हैं बच्चों के लिए ले जा रहे हैं।

Hasya Hathauda ShadiKaKhana : इसी बीच दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर खड़े-खड़े सोच रहे होते हैं, “काश हम भी एक प्लेट लेकर आराम से खा पाते!” लेकिन नहीं, उन्हें तो फोटो और “कब शादी कर रहे हो?” जैसे सवालों की राजनीति झेलनी होती है।

शादी का सबसे दिलचस्प पल तब आता है, जब खाना खत्म होने लगता है। अचानक सबको वही डिश सबसे पसंद आने लगती है, जो बची ही नहीं।
“अरे यार, दही भल्ले खत्म हो गए? मुझे तो खाने ही थे!”
(जबकि 10 मिनट पहले वही कह रहे थे “दही भल्ले कौन खाता है!”)

आखिर में, जब शादी खत्म होती है, तो रिश्तेदार अपने-अपने निष्कर्ष लेकर जाते हैं,
“शादी ठीक थी, लेकिन खाने में थोड़ा सुधार होना चाहिए था…”

और अगले दिन से शुरू हो जाती है नई चर्चा, “फलां की शादी में क्या कमी थी।”

यही है भारतीय शादी का असली मजा, जहां एक प्लेट खाना और ढेर सारी रिश्तेदारों की राजनीति मिलकर ऐसा कॉम्बिनेशन बनाते हैं, जिसे कोई भी पांच सितारा होटल नहीं दे सकता। क्योंकि यहां स्वाद सिर्फ खाने में नहीं, बल्कि हर रिश्तेदार की बातों में भी होता है।

और सच कहें तो, अगर शादी में ये राजनीति न हो… तो खाना भी थोड़ा फीका ही लगेगा !

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