Dumka रानीश्वर में गूँजा ‘जय संताल’: पंडित रघुनाथ मुर्मू की 121वीं जयंती पर भव्य आयोजन, संताली को प्रथम राजभाषा बनाने की उठी मांग

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Dumka

रिपोर्टर: आगस्टीन हेम्बरम

Dumka जिले के रानीश्वर प्रखंड अंतर्गत कौरशिला, काठालिया, मोहनपुर और रखालपहाड़ी समेत दर्जनों गांवों में संताली भाषा की ‘ओलचिकी’ लिपि के जनक गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू की 121वीं जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में संताल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और भाषाई पहचान का उत्सव मनाया।

Dumka ओलचिकी लिपि के 101 वर्ष और ऐतिहासिक उपलब्धियां

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान को याद करते हुए बताया कि उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में वर्ष 1925 में ओलचिकी लिपि का आविष्कार किया था। आज इस गौरवमयी लिपि के 101 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस अवसर पर समाज में विशेष उत्साह देखा गया, क्योंकि हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा गुरु गोमके के नाम पर डाक टिकट और 100 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया गया है। साथ ही, भारतीय संविधान का संताली (ओलचिकी) संस्करण प्रकाशित होना भी समाज के लिए गौरव का विषय रहा।

Dumka परंपरागत पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक झलक

विभिन्न गांवों में ग्रामीणों ने गुरु गोमके के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। आदिवासी परंपरा के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना की गई, जिसके बाद कई स्थानों पर पारंपरिक नाच-गान और रैलियों का आयोजन हुआ। संताल बहुल क्षेत्रों में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में हिस्सा लेकर भाषाई एकजुटता का संदेश दिया।

Dumka मुख्यमंत्री से बड़ी मांगें: प्रथम राजभाषा और शिक्षा पर जोर

इस पावन अवसर पर समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन और अन्य ग्रामीणों ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कुछ महत्वपूर्ण मांगें साझा कीं:

  • प्रथम राजभाषा: संताली भाषा को झारखंड राज्य की प्रथम राजभाषा का दर्जा दिया जाए।
  • शिक्षा का माध्यम: पश्चिम बंगाल की तर्ज पर झारखंड में भी केजी (KG) से पीजी (PG) तक की शिक्षा संताली (ओलचिकी) माध्यम से प्रारंभ की जाए।
  • प्रशासनिक उपयोग: संताल बहुल क्षेत्रों के सभी सरकारी कार्यालयों के साइनबोर्ड और सूचनाएं ओलचिकी लिपि में भी लिखी जाएं।

उपस्थिति

कार्यक्रम में समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन, बाबूलाल मुर्मू, दिनेश सोरेन, ठाकुर सोरेन, मनियल मराण्डी, जोबा सोरेन, वीणा हांसदा, मकलु किस्कु, प्रियंका सोरेन, सिकंदर मुर्मू समेत भारी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। ग्रामीणों ने गुरु गोमके के आदर्शों पर चलने और अपनी भाषा-संस्कृति को संरक्षित करने का संकल्प लिया।

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