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कथावाचक पर फिर बवाल: क्या जाति छिपाने का आरोप सही है या सियासी खेल?

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Controversy again over the narrator: Is the allegation of hiding caste correct or a political game?

रिपोर्ट -विकास गुप्ता, लखीमपुरखीरी, by: vijay nandan

लखीमपुर खीरी: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में एक भागवत कथावाचक पर अपनी जाति छिपाकर लोगों के पैर छुआने का आरोप लगा है, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मामला इतना बढ़ गया कि कथावाचक को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। इस घटना को लेकर इटावा जैसी घटना की पुनरावृत्ति होने की आशंका जताई गई थी। हालांकि, जब ‘स्वदेश न्यूज़’ की टीम ने मामले की पड़ताल की, तो कुछ और ही सच्चाई सामने आई।

कथावाचक पर आरोप और उनका खंडन

आरोप है कि कथावाचक ने खुद को ब्राह्मण बताया और फिर कथा की। इस दौरान कई लोगों ने उनके पैर छूए, जिनमें ब्राह्मण समाज के लोग भी शामिल थे। बाद में जब उनकी असली जाति (मौर्य) का खुलासा हुआ, तो लोगों में गुस्सा फैल गया। हालांकि, कथावाचक आचार्य पारस मणि जी महाराज ने इन आरोपों का खंडन किया है। उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने कभी भी अपनी पहचान नहीं छिपाई। उन्होंने बताया कि जब वह कथा के लिए स्थान देखने आए थे, तभी उन्होंने मंदिर के पुजारी को बता दिया था कि वह जाति से मौर्य हैं, लेकिन उनके गुरु ब्राह्मण हैं।

विवाद के पीछे क्या सियासी साजिश?

मंदिर के पुजारी और कथावाचक के बयानों से यह बात साफ हो रही है कि इस पूरे विवाद के पीछे एक सियासी साजिश हो सकती है। आरोप है कि स्थानीय विधायक के कुछ लोगों ने कथा के समापन पर दान में आए पैसे का आधा हिस्सा मांगा था। जब कथावाचक ने इसका विरोध किया, तो उन्होंने उनकी जाति को मुद्दा बनाकर माहौल खराब करने की कोशिश की। इसके बाद, दबाव में आकर कथावाचक को मंच से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने यह भी बताया कि उन लोगों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी और कहा था कि “किसी को कुछ पता नहीं चलेगा।” इस घटना के बाद कथावाचक और उनकी पूरी मंडली को जान का खतरा महसूस होने लगा।

विश्व हिंदू परिषद और संतों की राय

इस पूरे मामले पर विश्व हिंदू परिषद के आचार्य संजय मिश्रा ने कहा है कि कथा कहना कोई अपराध नहीं है, लेकिन जाति छिपाकर लोगों के पैर छुआना गलत है। वहीं, आचार्य पारस मणि जी महाराज का कहना है कि संत समाज में जाति का प्रदर्शन नहीं किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पूर्व नाम श्री अजय मोहन सिंह बिष्ट है.

यह घटना धार्मिक आस्था और राजनीति के बीच एक खतरनाक टकराव को दर्शाती है। जहां एक तरफ जाति को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह भी साफ हो रहा है कि इसके पीछे पैसे और राजनीतिक वर्चस्व का खेल है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में कोई कार्रवाई करता है या नहीं। फिलहाल, आचार्य पारस मणि जी अपनी अगली कथा की तैयारी में लगे हुए हैं, जो ईसानगर में प्रस्तावित है।

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