Report by: Ajay Nigam
London: सात समुद्र पार लंदन की पावन भूमि पर सनातन धर्म के वैश्विक विस्तार की एक नई इबारत लिखी गई। यहां स्थित “सिद्धाश्रम” के स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर अत्यंत भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ, जिसमें देश-विदेश से पधारे 25 उच्च कोटि के संतों-महात्माओं ने सहभागिता की। मंत्रोच्चार के बीच सम्पन्न हुए भूमि पूजन के साथ यह स्थल आने वाले समय में विदेशी धरती पर सनातन संस्कृति के गौरवशाली प्रतीक के रूप में स्थापित होगा और भारतीय संस्कृति की ध्वजा पूरे यूरोप में फहराएगा।
इस अवसर पर जगद्गुरु स्वामी चक्रपाणि जी महाराज ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि जब आज सम्पूर्ण विश्व के समक्ष अंधकार और भ्रम की स्थिति व्याप्त है, ऐसे समय में हिन्दू सनातन धर्म ही मानवता को सच्ची और सही दिशा दिखा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत भूमि से निकला यह सनातन ज्ञान आज पुनः पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम बन रहा है, और लंदन जैसी धरती पर इसकी स्थापना यह सिद्ध करती है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव केवल भारत की सीमाओं में सीमित नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का मार्ग है। उन्होंने कहा कि इसीलिए आवश्यकता है कि सबको साथ लेकर चलने की क्षमता रखने वाले संतों और संगठनों को आगे आना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी राजराजेश्वरानंद गुरुजी महाराज ने हिन्दू सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु जो अथक और तपस्यापूर्ण कार्य किया है, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है।
कार्यक्रम में पण्डोखर सरकार ने भी अपने विचार रखते हुए सनातन एकता पर बल दिया और कहा कि भारत और प्रवासी भारतीय समाज के बीच की यह आध्यात्मिक कड़ी ही आने वाले समय में विश्व शांति का आधार बनेगी। वहीं श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज तथा श्री त्रिलोचनदास जी महाराज ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर उपस्थित सभी संतों ने एक-दूसरे से मिलकर सनातन धर्म एवं हिन्दुत्व की विचारधारा को विश्वभर में प्रचारित करने का संकल्प लिया तथा भविष्य में भी निरंतर लंदन आते रहने का वचन दिया।
कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता एवं संत संसद के आयोजनकर्ता, नेटवर्क 10 के मुख्य संपादक आदरणीय संजय गिरी जी ने कहा कि संत संसद का सम्पूर्ण विश्व को जोड़ने का जो विचार है, वह निरंतर आगे बढ़ता रहेगा और इसे पूरे विश्व में प्रचारित-प्रसारित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत और प्रवासी भारतीय समाज की श्रद्धा जब एक मंच पर आती है, तो वह न केवल हिन्दुस्तान अपितु सम्पूर्ण विश्व को एक नई दिशा प्रदान करती है।
गर्जना भरे स्वर में जगद्गुरु स्वामी चक्रपाणि जी महाराज ने कहा कि भारत को विश्वगुरु बनने से अब कोई शक्ति नहीं रोक सकती, क्योंकि भारत सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” अर्थात सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने के महान सिद्धांत को लेकर चलता आया है। उन्होंने विश्वभर में बसे भारतवंशियों का आह्वान करते हुए कहा कि वे जहां भी रहें, अपनी जड़ों और संस्कारों से जुड़े रहें, क्योंकि यही सनातन परंपरा भारत और विश्व के बीच अटूट सेतु का कार्य करेगी।
कार्यक्रम के दौरान सभी संतों एवं श्रद्धालुओं ने हवन-पूजन में भाग लिया, जिसमें पण्डोखर सरकार सभी पूज्य संतों के साथ हवन कुंड में आहुतियां अर्पित कीं। इसके पश्चात वैदिक मंत्रों द्वारा सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया गया तथा सभी उपस्थितजनों ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया। समापन पर सिद्धाश्रम परिसर “धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो” के गगनभेदी नारों से गूंज उठा।
इस पावन अवसर पर जगद्गुरु स्वामी चक्रपाणि जी महाराज एवं श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज (जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता) एवं स्वामी राजराजेश्वरानंद गुरुजी महाराज के साथ महामंडलेश्वर महंत यतींद्रानंद गिरी जी, महामंडलेश्वर उमाकांतानंद जी, श्री महंत स्वामी रिशेश्वरानंद जी, पद्मश्री गोवा स्वामी जी एवं माताजी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन निरंजन स्वामी जी ने किया, संत त्रिलोकदास महाराज जी ने हनुमान चालीसा का पाठ कराया तथा महामंडलेश्वर स्वामी भूपेंद्र गिरी जी एवं अजय बाबा ने अपने विचार रखे। इनके अतिरिक्त अनेक पूज्य संत-महात्मा एवं गणमान्य जन इस भव्य आयोजन में उपस्थित रहे।
समूचे कार्यक्रम के सुव्यवस्थित संयोजन में नेटवर्क 10 के मुख्य संपादक आदरणीय संजय गिरी जी का विशेष एवं अविस्मरणीय योगदान रहा। कार्यक्रम के मुख्य आयोजनकर्ता सिद्धाश्रम के प्रमुख श्री राजराजेश्वर गुरुजी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी संतों को यहां सदैव स्वागत एवं सम्मान प्राप्त होगा। उन्होंने पूरे विश्व में सनातन धर्म की पताका लहराने और भारत को उसकी सांस्कृतिक गरिमा के अनुरूप विश्वगुरु के पद पर पुनर्स्थापित करने का उद्घोष किया। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु उपस्थित हुए और विशाल स्वादिष्ट भंडारे का आयोजन भी हुआ, जिसमें सभी पूज्य संतों का सम्मान विधि-विधानपूर्वक किया गया। इस प्रकार लंदन की धरती पर आयोजित यह भव्य समारोह भारत और सम्पूर्ण विश्व को सनातन संस्कृति के सूत्र में जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक अध्याय बनकर उभरा।



