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Aajadi :1857 से 1947 तक: दास्तान-ए-आज़ादी — गुलामी की जंजीरें तोड़कर भारत ने ऐसे रचा इतिहास

Aajadi

Aajadi 15 अगस्त 1947 को भारत ने वर्षों की ब्रिटिश गुलामी के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सांस ली थी। यह आजादी केवल एक राजनीतिक फेरबदल नहीं थी, बल्कि लगभग एक सदी तक चले जन-आंदोलनों, अनगिनत शहादतों और संघर्षों की महागाथा थी। आइए जानते हैं 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से लेकर 1947 में विभाजन और आजादी तक का पूरा ऐतिहासिक घटनाक्रम।

Aajadi 1857 का महासंग्राम: ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली ललकार

भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ पहला बड़ा संगठित विद्रोह 1857 में देखने को मिला। मंगल पांडे द्वारा बैरकपुर में जलाई गई बगावत की चिंगारी ने देखते ही देखते पूरे उत्तर और मध्य भारत को अपनी चपेट में ले लिया।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में देश ने आजादी का पहला शंखनाद किया। यद्यपि ब्रिटिश सेना ने इस विद्रोह को कुचल दिया, लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया और भारत की बागडोर सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चली गई।

Aajadi गांधीवादी युग: जब सत्याग्रह और अहिंसा बने राष्ट्र का सबसे बड़ा हथियार

20वीं सदी के दूसरे दशक में स्वतंत्रता आंदोलन एक नए दौर में दाखिल हुआ। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने इस लड़ाई की कमान संभाली और इसे जन-आंदोलन का रूप दिया।

  • असहयोग आंदोलन (1920): देशव्यापी स्तर पर ब्रिटिश वस्तुओं, अदालतों और शिक्षण संस्थानों का पूर्ण बहिष्कार किया गया।
  • दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह (1930): साबरमती से दांडी तक पैदल यात्रा कर गांधीजी ने अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ा, जिससे सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई।

इसी दौरान भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों की शहादत ने देश के युवाओं में देशभक्ति का नया जज्बा भर दिया।

Aajadi ‘करो या मरो’: 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और अंतिम संघर्ष

Aajadi 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने पर अंग्रेजों ने भारतीयों की मर्जी के खिलाफ देश को युद्ध में झोंक दिया। जब 1942 का क्रिप्स मिशन भारत की स्वतंत्रता की मांगों को पूरा करने में विफल रहा, तो महात्मा गांधी ने अपने जीवन के सबसे बड़े आंदोलन का आह्वान किया।

8 अगस्त 1942 को मुंबई के गवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने “करो या मरो” का ऐतिहासिक नारा दिया। प्रमुख शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद पूरा देश सड़कों पर उतर आया, जिसने ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब भारत में उनकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

Aajadi सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज: सैन्य चुनौती से कांपी ब्रिटिश हुकूमत

देश के भीतर जारी आंदोलनों के बीच नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजों को घेरने की रणनीति बनाई। उन्होंने देश से बाहर जाकर ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) का पुनर्गठन किया और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का नारा दिया।

आजाद हिंद फौज के सैन्य अभियानों और युद्ध के बाद लाल किले पर INA के अफसरों पर चले मुकदमों ने भारतीय जल और थल सेना के भीतर विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। 1946 का ‘शाही नौसेना विद्रोह’ (Royal Indian Navy Mutiny) अंग्रेजों के ताबूत में अंतिम कील साबित हुआ।

माउंटबेटन योजना और विभाजन का फैसला

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो चुकी थी और भारत में बढ़ता जन-आक्रोश संभालना उनके लिए असंभव हो गया था।

ब्रिटेन ने लॉर्ड माउंटबेटन को अंतिम वायसराय बनाकर भारत भेजा। 3 जून 1947 को ‘माउंटबेटन योजना’ की घोषणा की गई, जिसके तहत भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ देश के दो टुकड़ों (भारत और पाकिस्तान) में विभाजन की रूपरेखा तय की गई। जुलाई 1947 में ब्रिटिश संसद ने ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ पास कर 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण की तिथि घोषित कर दी।

आजादी की वो मध्यरात्रि: खुशियों का जश्न और विभाजन की त्रासदी

14 और 15 अगस्त 1947 की दरमियानी रात भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद भवन से अपना प्रसिद्ध भाषण ‘Tryst with Destiny’ (नियति से वादा) देते हुए कहा:

“जब आधी रात को दुनिया सो रही होगी, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।”

15 अगस्त की सुबह दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराया गया। लेकिन इस आजादी के साथ विभाजन का गहरा दर्द भी जुड़ा था। रेडक्लिफ रेखा खिंचते ही इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ, जिसमें लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा और भड़की सांप्रदायिक हिंसा में भारी जन-धन की हानि हुई।

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