SIR Controversy: 10 महीने में 14 बार उठी आपत्ति, रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद
SIR Controversy के बीच चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।
SIR Controversy: कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
SIR Controversy को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की है। 28 सितंबर को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन किए और CEC के खिलाफ नारेबाजी की। दिल्ली में यूथ कांग्रेस और NSUI के प्रदर्शन की भी रिपोर्ट सामने आई है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूचियों से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता की कमी रही है। हालांकि, मतदाता सूची में कथित हेरफेर जैसे आरोप राजनीतिक दलों के दावे हैं और इन्हें अंतिम रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।
SIR Controversy: विपक्ष के आरोपों पर बीजेपी का क्या कहना है?
SIR Controversy पर बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। सत्ता पक्ष की ओर से कहा गया है कि चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के बीच सुझाव या मतभेद होना अपने आप में किसी संवैधानिक संस्था के विफल होने का प्रमाण नहीं है। बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने के आरोप लगाए हैं।
बीजेपी का तर्क है कि चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं और मतदाता सूची को लेकर उठाए जा रहे सवालों को राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां उसकी चिंताओं को गंभीर बनाती हैं।
SIR Controversy: चुनाव आयोग के अंदर क्या हुआ?
SIR Controversy की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कुछ फैसलों को लेकर सवाल उठाए और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण, Form-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम पर भी चिंता जताई। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ आपत्तियों में ऐसे कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया गया था।
हालांकि, इस रिपोर्ट में सामने आए आरोपों के बावजूद यह अलग से महत्वपूर्ण है कि किसी आंतरिक आपत्ति को अपने आप चुनावी धांधली का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
SIR Controversy: चुनाव आयोग का तर्क- फैसले कानून और प्रक्रिया के तहत
SIR Controversy के बीच चुनाव आयोग की ओर से यह रुख सामने आया है कि आयोग के फैसले कानून और संविधान के दायरे में लिए जाते हैं। रिपोर्टों में आयोग के हवाले से कहा गया है कि आंतरिक नोट, सुझाव और असहमति किसी संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हो सकते हैं और इन्हें अपने आप असंवैधानिक गतिविधि नहीं माना जा सकता।
ECI की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वर्तमान आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं।
SIR Controversy: क्या ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है?
SIR Controversy के बीच CEC के इस्तीफे और हटाने की मांग ने संवैधानिक प्रक्रिया का सवाल भी खड़ा किया है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश आवश्यक होती है।
इसलिए केवल राजनीतिक मांग उठने से CEC का पद स्वतः समाप्त नहीं होता। आगे की कार्रवाई के लिए संविधान और संबंधित कानून में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है।
SIR Controversy: अब आगे क्या होगा?
SIR Controversy के बीच फिलहाल तीन स्तरों पर घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेगा—चुनाव आयोग की ओर से आगे की सफाई, राजनीतिक दलों की अगली रणनीति और अदालतों में SIR से जुड़े मामलों की सुनवाई। 28 सितंबर को देश के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद विवाद सड़क से लेकर संस्थागत और न्यायिक मंचों तक पहुंच चुका है।
ऐसे में आगे की तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि आयोग की आंतरिक आपत्तियों, SIR की प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर संबंधित संवैधानिक तथा न्यायिक संस्थाओं की ओर से क्या कदम सामने आते हैं।
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