BY
Yoganand Shrivastava
New Delhi आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 के विद्रोह ने देश में एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। राघव चड्ढा के नेतृत्व में इन सांसदों के भाजपा में शामिल होने की खबरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनकी सदस्यता बचेगी या वे ‘दल-बदल विरोधी कानून’ की चपेट में आएंगे? संविधान विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की राय इस मामले में बंटी हुई नजर आ रही है।

New Delhi संविधान की 10वीं अनुसूची और ‘दो-तिहाई’ का कवच
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और नीरज किशन कौल के अनुसार, संविधान की 10वीं अनुसूची का पैरा 4(2) ऐसे मामलों में सांसदों को सुरक्षा प्रदान करता है। नियम कहता है कि यदि किसी सदन में किसी पार्टी के विधायी दल (Legislature Party) के दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ अलग होकर किसी अन्य दल में विलय (Merge) करते हैं, तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती। चूंकि ‘आप’ के राज्यसभा में कुल 10 सदस्य हैं और उनमें से 7 अलग हुए हैं, जो कि दो-तिहाई से अधिक है, इसलिए तकनीकी रूप से उनकी सदस्यता पर खतरा कम नजर आता है।

New Delhi ‘मूल राजनीतिक दल’ बनाम ‘विधायी दल’ का पेंच
वहीं, दूसरी ओर प्रसिद्ध वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर अलग तर्क दिया है। उनका कहना है कि केवल ‘विधायी दल’ का अलग होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘मूल राजनीतिक दल’ (Original Political Party) का भी विलय होना आवश्यक है। सिंघवी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि संसद के भीतर का दल और चुनाव आयोग में पंजीकृत संगठन दो अलग इकाइयां हैं। उन्होंने वर्तमान दल-बदल कानून को ‘बेकार’ बताते हुए सुझाव दिया कि दलबदल करने वाले को सीधे अयोग्य घोषित कर दोबारा चुनाव लड़ने का प्रावधान होना चाहिए।

New Delhi स्पीकर की भूमिका और कानूनी नजीरें
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय सदन के सभापति (स्पीकर) का होता है। नीरज किशन कौल ने ‘शिवसेना’ मामले का उदाहरण देते हुए बताया कि यदि विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य विलय को स्वीकार करते हैं, तो यह अयोग्यता से बचने का एक वैध बचाव माना जाता है। हालांकि, यह मामला अदालत तक जाने की पूरी संभावना है, क्योंकि ‘आप’ का नेतृत्व इसे मूल दल के विलय के बिना की गई अवैध बगावत करार दे रहा है।





