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स्पेशल स्टोरी: कैसे कुत्तों ने इंसानों के साथ सच्चे साथी का रिश्ता बनाया, क्या है निष्ठा-विश्वास और धर्म की कहानी, अब दूरी की दास्तान…

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Special Story: A tale of man and dog, loyalty, faith, religion and distance...

कुत्तों ने इंसान की भाषा सीखी, लेकिन क्या इंसान में ‘कुत्तापन’ रास्ता भटक गया ?

special story by: vijay nandan

भारत में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने एक नई बहस को जन्म दिया है। अदालत ने कहा है कि जिन इलाकों से आवारा कुत्तों को पकड़ा जाएगा, उन्हें दोबारा उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाएगा। साथ ही स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों के आसपास से स्ट्रे डॉग्स को हटाने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश आते ही देश दो हिस्सों में बंट गया, एक तरफ प्रशासन, जिसे सुरक्षा और स्वच्छता की चिंता है, दूसरी तरफ डॉग लवर्स, जो इसे “अमानवीय” और “असंतुलित” बताते हैं। लेकिन असली सवाल सिर्फ सड़कों पर घूमते कुत्तों का नहीं है। सवाल है इंसान और कुत्ते के रिश्ते का, जो हजारों-लाखों साल पुराना है। क्या है कुत्तों की कुत्ता बनने की कहानी, कुत्ते पहले क्या थे, इंसान के साथ उन्होंने अपना रिश्ता कैसे बनाया। सनातन में श्वान (कुत्तों) को किस देवता का दूत बताया गया है। इस लेख में हर सवाल का जवाब जानिए विस्तार से..

फादारी की कहानी: जब कुत्ता इंसान का साथी बना

रिसर्च के मुताबिक इंसान और कुत्तों का रिश्ता 40 हजार साल पहले शुरू हुआ बताया जाता है। उस समय इंसान.. इंसान बनने की यात्रा पर था तब वह आखेट करने जंगल जाता था। जंगल में शिकार के बाद भोजन बनाया जाता है, इंसान भोजन करने के बाद बचा खुचा भोजन भेड़ियों को डाल देता था। यहीं से इंसान और कुत्तों के बीच रिश्तों की शुरूआत बताई जाती है। भेड़ियों को भोजन डालने की ये घटना बार-बार दोहराई गई और इससे ही भेड़ियों और इंसानों में एक रिश्ता कायम हुआ। धीरे-धीरे यही भेड़िये इंसानों की पीछे-पीछे चल कर उनके घर तक पहुंच गए। इसके पीछे सबसे बड़ा विश्वास, भोजन और सुरक्षा का था। कहा जाता है कि लंबे समय तक भेड़िये इंसानों के घर के बाहर मंडराते रहे और एक दिन ऐसा आया कि वे इंसानों के घर में प्रवेश कर गए. जब इंसानों के घर में रहने लगे तो इनके जीन अपने आप परिवर्तन हो गए और इस तरह से भेड़िये कुत्ता बन गए । उसके बाद उन्होंने जंगल छोड़कर इंसानों के साथ रहना शुरू कर दिया। भेड़िये से कुत्ता बने कुत्तों ने इंसान की भाषा, भावनाएं और रहन-सहन सीख लिया। कुत्तों ने इंसानों के घरों की रखवाली करना, बच्चों के खेल में साथी बनना सीख लिया…यानि कुत्ता इंसान का सबसे वफादार साथी बन गया। तब से अब तक ये रिश्ता यूं ही चलता आ रहा है, लेकिन शायद अब वक्त बदल गया है। इंसान ने उसे “साथी” से ज़्यादा “मुसीबत” मानना शुरू कर दिया है। कभी इंसान ने उसे परिवार का हिस्सा बनाया, अब वही इंसान उसे बस्ती से निकालने की बात कर रहा है।

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‘धर्मराज’ युधिष्ठिर से जुड़ी श्वान की कहानी

क्या वाकई इंसान और कुत्ते के बीच का विश्वास टूट रहा है ? या फिर यह वही समय है, जब हमें सोचना चाहिए, “कुत्ते में इंसानियत बची है, या इंसान में कुत्तापन आ गया है? सनातन धर्म में श्वान का स्थान, निष्ठा से लेकर धर्म तक है। सनातन दृष्टि से देखें तो कुत्ता कोई साधारण जीव नहीं है। वह निष्ठा, धर्म और सतर्कता का प्रतीक है।

महाभारत में युधिष्ठिर की कथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर बढ़े, तो एक श्वान उनके साथ चला। रास्ते में पांड़व एक एक कर गिरते गए, द्रोपदी भी गिर गई, लेकिन कुत्ता अंत तक युधिष्ठिर के साथ रहा। जब युधिष्ठिर स्वर्ग के रथ पर चढ़ने लगे और साथ में कुत्ता भी उस पर चढ़ने लगा तो इंद्र ने कहा कि इस कुत्ते को छोड़ दो, यह स्वर्ग में नहीं आ सकता। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि ‘मैं उस जीव को नहीं त्यागूंगा जिसने मेरे साथ निष्ठा निभाई। यह अधर्म होगा। तभी वह कुत्ता धर्मराज यम के रूप में प्रकट हुआ। यह वही क्षण था जब युधिष्ठिर ने ‘धर्म की परीक्षा’ उत्तीर्ण की थी। तब से श्वान निष्ठा और धर्म का जीवंत प्रतीक माना गया।

भैरव और श्वान रक्षक का प्रतीक

शिव का उग्र रूप काल भैरव की पूजा में श्वान को वाहन माना गया है। भैरव भक्त काले कुत्ते को भोजन कराते हैं। इसे पाप क्षय और रक्षा का प्रतीक माना जाता है। भैरव मंदिरों के बाहर बैठे काले श्वान हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा रक्षक वो नहीं जो तांडव करता है, बल्कि वो जो चुपचाप पहरा देता है।

यमराज के द्वारपाल और कर्म का सन्देश

गरुड़ पुराण और अथर्ववेद बताते हैं कि यमराज के द्वार पर दो कुत्ते पहरा देते हैं, शबला और श्यामा। वे न्याय और कर्मफल के प्रहरी हैं। वे सिखाते हैं कि हर जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु अपने कर्मों से ही आगे बढ़ता है। वर्तमान काल में भी समाज में कुत्ता पालने की परंपरा के पीछे एक किवदंति प्रचलित है। कहा जाता है कि कुत्ते घर में आने वाले हर संकट को पहले से भांप लेते हैं और भौंकने लगता है.

विज्ञान और समाज के बीच फंसे श्वान

वैज्ञानिक दृष्टि से भी कुत्ते का अपना क्षेत्र (territory) होता है। जब किसी कुत्ते को दूसरे इलाके में छोड़ दिया जाता है, तो वहाँ पहले से बसे झुंड उसे स्वीकार नहीं करते हैं, परिणामस्वरूप संघर्ष होता है, और कई बार उसकी मौत तक हो जाती है। यही कारण है कि अब तक नियम था कि इलाज या टीकाकरण के बाद कुत्ते को उसकी मूल जगह पर ही छोड़ा जाए। जानकारों का कहना है कि अदालत के आदेश पर प्रश्नचिह्न नहीं है लेकि लेकिन अब अदालत का नया आदेश इस पारिस्थितिक संतुलन को चुनौती तो दे रहा है।

इंसान और श्वान के बीच बढ़ती दूरियां

कभी इंसान ने कुत्तों को सभ्यता की परिधि में लाया था,
अब वही सभ्यता उन्हें शहरों से बाहर धकेल रही है।
कभी श्वान इंसान की भाषा समझने की कोशिश करता था,
अब इंसान उसकी मनोस्थिति तक नहीं समझ पा रहा।
शायद यहीं कहीं हमने उस रिश्ते की गर्मी खो दी है, जो “मनुष्य” और “पशु” के बीच नहीं, बल्कि दो आत्माओं के बीच विश्वास का रिश्ता था।

क्या हम परीक्षा में फिर असफल हो रहे हैं?

जब युधिष्ठिर ने श्वान को त्यागने से इनकार किया, वह “धर्म की परीक्षा” थी। आज जब इंसान अपने समाज से श्वानों को हटाने की बात कर रहा है तो क्या यह हमारी करुणा की परीक्षा नहीं है? जबकि सनातन धर्म हमें सिखाता है कि..

“जीओ और जीने दो”
“प्रत्येक प्राणी में आत्मा का वास है।”

अगर हम यह भूल जाएं, तो सिर्फ श्वान नहीं

ये लेखक के अपने विचार हैं, (मानवता, सनातन धर्म और पर्यावरण के प्रश्नों पर लिखने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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