Rohtas : सिस्टम की ‘बहराइची’ का शिकार एक दिव्यांग, 10 वर्षों से प्रमाण पत्र लेकर पेंशन और मदद के लिए भटक रहा परिवार

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रिपोर्ट: अविनाश श्रीवास्तव

Rohtas  बिहार में सुशासन और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने के दावों के बीच रोहतास जिले से एक बेहद शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। दरिगांव थाना क्षेत्र के मलांव गांव का 18 वर्षीय सुधीर शर्मा पिछले एक दशक से सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। जन्मजात दिव्यांगता और वैध प्रमाण पत्र होने के बावजूद, प्रशासन की फाइलों में सुधीर का हक कहीं दबा हुआ है।

दफ्तरों की चौखट और जनप्रतिनिधियों का सिर्फ झूठा आश्वासन

Rohtas  सुधीर के पिता संतोष शर्मा, जो पेशे से एक साधारण फर्नीचर कारीगर हैं, पिछले 10 साल से अपने बेटे का दिव्यांगता प्रमाण पत्र लेकर अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट रहे हैं। पिता का आरोप है कि उन्होंने ब्लॉक से लेकर जिला मुख्यालय तक हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर बार उन्हें केवल ‘आश्वासन’ देकर वापस भेज दिया गया। आलम यह है कि एक दशक बीत जाने के बाद भी सरकारी रिकॉर्ड में सुधीर को पेंशन के योग्य नहीं समझा गया।

बेटे को कंधे पर ढोते बेबस पिता, न पेंशन मिली न ट्राईसाइकिल

Rohtas  हैरानी की बात यह है कि जहाँ सरकार ‘दिव्यांगों के सशक्तिकरण’ के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती है, वहीं सुधीर को आज तक न तो बुनियादी पेंशन नसीब हुई और न ही चलने-फिरने के लिए कोई सहायक उपकरण (जैसे ट्राईसाइकिल)। शुक्रवार को भी सदर अस्पताल में एक मर्मस्पर्शी मंजर देखा गया, जहाँ आर्थिक तंगी से जूझ रहे संतोष शर्मा अपने जवान बेटे को कंधे पर लादकर दफ्तरों के गलियारों में भटकते नजर आए।

समाज कल्याण विभाग की कार्यशैली पर खड़े हुए गंभीर सवाल

Rohtas  यह मामला केवल एक परिवार की बेबसी का नहीं, बल्कि समाज कल्याण विभाग की घोर लापरवाही का प्रमाण है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब 10 साल पहले ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र बन चुका था, तो सुधीर को योजनाओं की मुख्यधारा से बाहर क्यों रखा गया? कागजी प्रक्रिया और सिस्टम की सुस्ती ने एक गरीब परिवार की उम्मीदों को तोड़ दिया है। अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद जिला प्रशासन जागता है या सुधीर की फाइल धूल फांकती रहेगी।

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