BY: Yoganand Shrivastva
Parents can evict children सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के संपत्ति और सम्मान से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर माता-पिता अपने बच्चों को घर से बेदखल कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है। यदि बच्चे उनके भरण-पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी नहीं करते हैं, तो कानून के तहत उन्हें संपत्ति से हटाने का आदेश दिया जा सकता है।
बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ट्रिब्यूनल को अधिकार
Parents can evict children जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन उपलब्ध कराना है। अदालत के मुताबिक, किसी बुजुर्ग को उसके ही घर में असुरक्षित या अपमानित स्थिति में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल के पास परिस्थितियों के अनुसार बच्चों को संपत्ति से बाहर करने का आदेश देने की शक्ति है।
लखनऊ के मकान से शुरू हुआ पूरा विवाद
Parents can evict children मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की संपत्ति से जुड़ा था। गुप्ता ने जून 2022 में अपने बेटे को मकान से हटाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। यह मकान उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति थी।
Parents can evict children मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद SDM ने नवंबर 2022 में बेटे की बेदखली का आदेश दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने भी अगस्त 2023 में इस आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा
Parents can evict children बेटे और बहू ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने 2021 के एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले सहित बाद के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, संरक्षण और गरिमा देता है। बढ़ती उम्र किसी व्यक्ति को असुरक्षित या अपमानित जीवन जीने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं हो सकती।




