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गिरफ्तारी पर नहीं चलेगी पुलिस की मनमानी: सुप्रीम कोर्ट ने लिखा कारण बताना अनिवार्य

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Dhar Temple Dispute

BY: Yoganand Shrivastva

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और जांच एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी के दौरान उन्हें लिखित में कारण बताना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि यह केवल मौखिक रूप से बताने से पर्याप्त नहीं होगा। यह आदेश गुरुवार, 6 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच, चीफ जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस ए. जी. मसीह ने सुनाया।

यह आदेश 2024 वर्ली BMW हादसा केस से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाओं में यह सवाल उठाया गया था कि क्या बिना लिखित कारण बताए गिरफ्तारी करना संविधान का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि किसी भी कानून के तहत गिरफ्तारी हो—चाहे वह आईपीसी, BNS या मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) हो—गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत और समझने योग्य भाषा में लिखित कारण देना आवश्यक है।

आदेश की मुख्य बातें:

  1. संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत हर व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार है।
  2. यह अधिकार सभी अपराध और कानूनों पर लागू होता है और आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
  3. लिखित कारण न बताने पर गिरफ्तारी और रिमांड दोनों अवैध मानी जा सकती हैं, और आरोपी को रिहा किया जा सकता है।
  4. अपवाद: कुछ असाधारण परिस्थितियों में लिखित कारण तुरंत उपलब्ध न हो तो आरोपी को मौखिक रूप से बताया जा सकता है, लेकिन दो घंटे के भीतर या मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले लिखित कारण देना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि गिरफ्तारी के दौरान व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पुलिस की जिम्मेदारी है।

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