Jamshedpur: माझी पारगना महाल ने डीसी को सौंपा ज्ञापन, ‘पेसा नियमावली’ का विरोध और अलग सरना धर्म कोड की मांग

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Report: Prem Shrivastva

Jamshedpur ‘माझी पारगना महाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था धाड़ दिशोम’ के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त (DC) से मुलाकात की। देस पारगना बाबा बैजू मुर्मू के नेतृत्व में पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त को पारंपरिक अंगवस्त्र भेंट कर उनका स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने झारखंड में लागू हुई पेसा (PESA) नियमावली के मौजूदा स्वरूप का विरोध करते हुए और आदिवासी समाज की विभिन्न ज्वलंत मांगों को लेकर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

Jamshedpur पेसा कानून और ग्राम सभा के अध्यक्षों के सत्यापन की मांग

Jamshedpur प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त के समक्ष बात रखी कि झारखंड प्रदेश में पेसा नियमावली लागू होने के बाद विभाग द्वारा धरातल पर इसके विस्तार के लिए जो निर्देश जारी किए जा रहे हैं, माझी पारगना महाल उसका विरोध करता है। महाल की मांग है कि नियमावली के अनुसार पेसा कानून का सही संचालन किया जाए। इसके तहत सबसे पहले प्रत्येक ग्राम सभा के अध्यक्ष के रूप में अनुसूचित जनजाति समुदाय के उन व्यक्तियों (जैसे माझी, पारगना, मुंडा, मानकी आदि) का आधिकारिक सत्यापन और प्रकाशन कर उन्हें प्रमाण पत्र दिया जाए, जो पारंपरिक रूप से इन पदों पर आसीन हैं। इसके बाद ही उनकी अध्यक्षता में बैठकों का आयोजन कर आगे के कार्यों को बढ़ाया जाए।

Jamshedpur राष्ट्रपति के नाम विरोध पत्र: लाल किला के ‘जनजाति समागम’ का बहिष्कार

इसके साथ ही, आदिवासी समाज ने उपायुक्त के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को एक विरोध पत्र भी भेजा है। इसमें आगामी 24 मई 2026 को नई दिल्ली के लाल किला मैदान में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ (हिंदूवादी संगठन) द्वारा आयोजित होने वाले ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ को आदिवासी विरोधी बताते हुए इसका पूर्ण बहिष्कार करने का ऐलान किया गया है। महाल का आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन आदिवासियों को जबरन हिंदू धर्म में शामिल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं और ‘सरना-सनातन एक है’ का भ्रामक राग अलाप रहे हैं, जिसे आदिवासी समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा।

Jamshedpur “आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, हमें मिले अलग सरना धर्म कोड”

Jamshedpur ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया कि आदिवासी समाज न तो कभी हिंदू या सनातनी था और न ही भविष्य में होगा। वे विशुद्ध रूप से प्रकृति के पूजक हैं और उनकी अपनी अनूठी रूढ़ि प्रथा, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, पूजा पद्धति और संस्कृति अन्य समुदायों से पूरी तरह भिन्न है। महाल ने केंद्र सरकार पर आदिवासी विरोधी मानसिकता का आरोप लगाते हुए कहा कि देश में 40 लाख की आबादी वाले जैन समुदाय को अलग धर्म कोड प्राप्त है, लेकिन 2011 की जनगणना में 50 लाख से अधिक लोगों द्वारा ‘सरना धर्म’ लिखे जाने के बावजूद आदिवासियों को अब तक अलग धर्म कोड की मान्यता नहीं दी गई है।

अंत में, महामहिम राष्ट्रपति से गुहार लगाई गई है कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, जल, जंगल, जमीन, भाषा-संस्कृति और शैक्षणिक व राजनीतिक आरक्षण को सुरक्षित रखने के लिए ‘सरना धर्म कोड’ को तुरंत मंजूरी दी जाए। इस ऐतिहासिक अवसर पर देस पारानिक बाबा दुर्गा चरन मुर्मू, शास्त्री हेंम्ब्रोम, रमेश मुर्मू, जगदीश बास्के, सुशांत हेंम्ब्रोम, कारु मुर्मू, मर्शाल मुर्मू और शत्रुघ्न मुर्मू सहित समाज के कई गणमान्य लोग भारी संख्या में उपस्थित थे।

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