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Ganga Water Treaty पर भारत बांग्लादेश के बीच अब तक नहीं बनी बात, 12 दिसंबर को खत्म हो रही 30 साल पुरानी डील; तारिक रहमान के दौरे पर भी अपडेट नहीं

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Ganga Water Treaty: भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि के नवीनीकरण को लेकर अभी तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। 30 साल पहले हुई यह संधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। ऐसे में दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर आगे की बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है। इस बीच भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नई दिल्ली दौरे की तारीखों को लेकर फिलहाल कोई नई जानकारी नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार, 3 नवंबर को मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को नई दिल्ली आने का निमंत्रण दिया है। वहीं, गंगा जल संधि के नवीनीकरण को लेकर उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच इस विषय पर चर्चा के लिए एक व्यवस्थित तंत्र मौजूद है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश के साथ सकारात्मक और रचनात्मक संबंध बनाए रखना चाहता है।

Ganga Water Treaty: तारिक रहमान की भारत यात्रा पर फिलहाल कोई नई जानकारी नहीं

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत दौरे को लेकर पूछे गए सवाल पर कहा कि उन्हें नई दिल्ली आने का निमंत्रण दिया गया है, लेकिन उनकी यात्रा की तारीखों को लेकर अभी कोई अपडेट नहीं है।

गंगा जल संधि के नवीनीकरण पर भी फिलहाल किसी नए समझौते या निर्णय की जानकारी साझा नहीं की गई है। संधि की अवधि समाप्त होने में अब कुछ ही सप्ताह बचे हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत पर नजर बनी हुई है।

जायसवाल ने कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा नदियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए संयुक्त नदी आयोग यानी जॉइंट रिवर कमीशन मौजूद है। यह आयोग गंगा समेत दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों से जुड़े विषयों पर बातचीत और समन्वय का माध्यम है।

Ganga Water Treaty: गंगा जल संधि को लेकर भारत का क्या है रुख?

भारत ने दोहराया है कि गंगा जल संधि से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए दोनों देशों के पास एक सुव्यवस्थित व्यवस्था है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत बांग्लादेश के साथ सकारात्मक, भविष्योन्मुखी और रचनात्मक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है।

संधि की समयसीमा नजदीक आने के बावजूद बांग्लादेश की ओर से नवीनीकरण को लेकर किसी नए प्रस्ताव या आधिकारिक अपडेट की जानकारी सामने नहीं आई है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में बांग्लादेशी राजनयिक सूत्रों के हवाले से यह संभावना जताई गई थी कि 12 दिसंबर को संधि की अवधि समाप्त होने के बाद इसे कुछ समय के लिए स्वतः आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, भारत की ओर से अभी तक इस तरह की किसी व्यवस्था की पुष्टि नहीं की गई है।

ऐसे में संधि के भविष्य को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत और आधिकारिक रुख महत्वपूर्ण हो गया है। पानी के बंटवारे से जुड़े इस समझौते का असर दोनों देशों के करोड़ों लोगों और कृषि गतिविधियों पर पड़ता है।

Ganga Water Treaty: बांग्लादेश के हालात पर भी नजर रख रहा है भारत

मीडिया ब्रीफिंग के दौरान बांग्लादेश में रेडीमेड गारमेंट उद्योग के कर्मचारियों के विरोध-प्रदर्शनों को लेकर भी सवाल पूछा गया। वहां के कर्मचारी बेहतर वेतन और कामकाज की स्थिति में सुधार की मांग कर रहे हैं। महंगाई और बिजली संकट के बीच इन प्रदर्शनों ने बांग्लादेश के औद्योगिक क्षेत्र की चुनौतियों को भी सामने रखा है।

इस पर रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत बांग्लादेश में हो रहे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने बताया कि वहां कुछ घटनाएं हुई हैं और भारत आगे भी स्थिति पर निगरानी रखेगा।

Ganga Water Treaty: 12 दिसंबर को समाप्त हो रही है 30 साल पुरानी गंगा जल संधि

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि पर 12 दिसंबर 1996 को हस्ताक्षर किए गए थे। उस समय भारत के प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना थीं। यह समझौता 30 वर्षों के लिए किया गया था, जिसकी अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी होने जा रही है।

इस संधि का मुख्य उद्देश्य सूखे के मौसम में गंगा नदी के पानी का दोनों देशों के बीच बंटवारा तय करना है। इसके तहत 1 जनवरी से 31 मई तक फरक्का बैराज पर उपलब्ध पानी के वितरण की व्यवस्था निर्धारित की गई है।

संधि के नवीनीकरण के लिए दोनों देशों को विशेषज्ञ और राजनीतिक स्तर पर बातचीत करनी होगी। इसमें पानी की उपलब्धता, दोनों देशों की जरूरतों और नदी के प्रवाह जैसे मुद्दों पर सहमति बनाना अहम होगा।

Ganga Water Treaty: गंगा जल संधि की जरूरत क्यों पड़ी थी?

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा सहित करीब 54 साझा नदियां बहती हैं। इन नदियों का पानी दोनों देशों के लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। पीने के पानी, खेती की सिंचाई, मछली पालन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए इन नदियों पर निर्भरता है।

इसी जरूरत को देखते हुए दोनों देशों ने 1996 में गंगा जल साझा करने का समझौता किया था। इसका उद्देश्य सूखे के मौसम में पानी के वितरण को लेकर विवादों को कम करना और दोनों देशों के हितों के बीच संतुलन बनाना था।

हालांकि, समय के साथ पानी की उपलब्धता, आबादी की जरूरतों और पर्यावरणीय परिस्थितियों में बदलाव आया है। इसलिए अब संधि के नवीनीकरण के दौरान इन सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी माना जा रहा है।

Ganga Water Treaty: फरक्का बैराज को लेकर बांग्लादेश में क्यों है विवाद?

गंगा जल संधि से जुड़ा सबसे संवेदनशील मुद्दा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में स्थित फरक्का बैराज है। इस बैराज का निर्माण गंगा नदी के पानी के एक हिस्से को हुगली नदी की ओर मोड़ने के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह में पानी का पर्याप्त प्रवाह बनाए रखने और जहाजों के आवागमन में मदद करना है।

बांग्लादेश में कुछ समूहों और विशेषज्ञों का मानना है कि फरक्का बैराज के कारण सूखे के मौसम में उनके हिस्से में पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है। उनका तर्क है कि भारत की ओर से नदी पर बनाए गए बैराज और अन्य जल संरचनाओं का असर गंगा के प्राकृतिक प्रवाह पर पड़ता है।

दूसरी ओर, भारत का पक्ष है कि फरक्का बैराज पानी के प्रवाह को नियंत्रित और मोड़ने की व्यवस्था है। इसके जरिए एक निश्चित मात्रा में पानी हुगली की ओर भेजा जाता है, जबकि शेष पानी बांग्लादेश की दिशा में बहता रहता है। इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच लंबे समय से अलग-अलग चिंताएं रही हैं।

Ganga Water Treaty: संधि में न्यूनतम पानी की गारंटी को लेकर मतभेद

गंगा जल संधि के नवीनीकरण में एक बड़ा मुद्दा पानी की न्यूनतम गारंटी से जुड़ा है। मौजूदा समझौते में 11 मार्च से 10 मई के बीच तीन अलग-अलग 10-दिवसीय अवधियों के दौरान दोनों देशों के लिए 35,000 क्यूसेक पानी के आवंटन का प्रावधान है।

हालांकि, बांग्लादेश में संधि की आलोचना करने वाले लोगों का कहना है कि इसमें ऐसी स्पष्ट न्यूनतम गारंटी नहीं है, जो फरक्का पर पानी का प्रवाह किसी 10-दिवसीय अवधि में 50,000 क्यूसेक से कम होने की स्थिति में बांग्लादेश के हिस्से को सुरक्षित कर सके।

बांग्लादेश के कुछ जल विशेषज्ञ और राजनीतिक दल इस प्रावधान को दोबारा शामिल करने की मांग करते रहे हैं। उनका मानना है कि सूखे के मौसम में नदी में पानी कम होने पर बांग्लादेश की जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम गारंटी जरूरी है। बांग्लादेश के राष्ट्रीय नदी संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष भी मौजूदा संधि की शर्तों पर सवाल उठा चुके हैं।

Ganga Water Treaty: न्यूनतम गारंटी के मुद्दे पर भारत की क्या है दलील?

न्यूनतम पानी की गारंटी को लेकर भारत का नजरिया अलग रहा है। नई दिल्ली का मानना है कि यदि फरक्का बैराज पर गंगा का प्रवाह 50,000 क्यूसेक से नीचे चला जाता है, तो दोनों देशों को पहले से तय किसी निश्चित हिस्से के बजाय आपसी सहमति और परिस्थितियों के आधार पर पानी का बंटवारा करना चाहिए।

इससे पहले 1977 के समझौते में न्यूनतम गारंटी से जुड़ा प्रावधान शामिल था। लेकिन 1982 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत इस शर्त को हटा दिया गया था। इसके बाद 1996 में मौजूदा गंगा जल संधि पर हस्ताक्षर हुए।

अब यदि बांग्लादेश इस शर्त को फिर से शामिल करने की मांग करता है, तो नवीनीकरण की बातचीत में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। भारत के लिए भी पानी की उपलब्धता और अपने घरेलू उपयोग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समझौते की शर्तें तय करना महत्वपूर्ण होगा।

Ganga Water Treaty: पर्यावरणविद संधि को नदी प्रबंधन से जोड़ने की कर रहे मांग

गंगा जल संधि को लेकर सिर्फ पानी के बंटवारे पर ही चर्चा नहीं हो रही है। भारत और बांग्लादेश के पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नए समझौते में नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को शामिल किया जाना चाहिए।

पर्यावरणविदों के अनुसार, संधि को केवल पानी के हिस्से तय करने तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक नदी बेसिन प्रबंधन समझौते का रूप दिया जाना चाहिए। इसमें नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जैव विविधता, गाद यानी सिल्ट के जमाव और जल संसाधनों के संरक्षण जैसे मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि नदी की सेहत का संबंध केवल पानी की मात्रा से नहीं है। नदी में बहने वाले पानी का प्राकृतिक चक्र, उसके आसपास का पर्यावरण और उससे जुड़े जीव-जंतुओं का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

ऐसे में 12 दिसंबर को संधि की अवधि समाप्त होने से पहले भारत और बांग्लादेश के सामने इसे लेकर सहमति बनाने की चुनौती है। दोनों देशों के बीच होने वाली आगामी बातचीत यह तय करेगी कि 30 साल पुराने समझौते को किस रूप में आगे बढ़ाया जाएगा और भविष्य में साझा नदी संसाधनों का प्रबंधन कैसे होगा।

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