डायन औरत ही क्यों होती है? मर्द क्यों नहीं?

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डायन औरत ही क्यों होती है? मर्द क्यों नहीं?

सोशल मीडिया पर ‘फेक न्यूज़’, ‘अफवाह’ और ‘रूमर’ जैसे शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में व्हाट्सएप यूनिवर्स की वो सारी झूठी खबरें घूमने लगती हैं, जिन्हें हम अक्सर फॉरवर्ड करके भूल जाते हैं। हमें लगता है कि अफवाहों का खेल सिर्फ फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम तक ही सीमित है। बड़े मीडिया चैनल्स तो फैक्ट चेक कर देते हैं, है ना?

लेकिन सच यही नहीं है।

अगर आप बिहार के पूर्णिया जिले के टेगामा गांव के उरांव परिवार से जाकर पूछें, तो शायद उनके पास जवाब देने को कुछ न बचे। क्योंकि जवाब अब पांच जली हुई लाशों की शक्ल में है। हां, पांच लोग—जिंदा जला दिए गए। वजह? एक अफवाह। कहा गया कि ये लोग काला जादू करते हैं। इन्हें ‘डायन’ कहा गया।

“डायन” — ये शब्द एक औरत की इज्जत छीनने का सबसे सस्ता हथियार बन चुका है।

जरा रुकिए, दूर मत जाइए। अपने आस-पास की उस बुज़ुर्ग महिला को याद कीजिए जो अकेली रहती है। जिसे लोग दबे स्वर में “चुड़ैल”, “मनहूस” या “काला जादू करने वाली” कहते हैं। इसी सोच ने समाज में “विच हंटिंग” जैसी घटनाओं को जन्म दिया है—जिसमें किसी महिला को डायन करार देकर भीड़ द्वारा मारा जाता है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि विच हंट के सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं होती हैं, वो भी ज्यादातर विधवा औरतें।


घटना की बर्बरता: पूर्णिया, बिहार की जलती रात

6 जुलाई की रात, पूर्णिया के टेगामा गांव में कुछ ऐसा हुआ जिसने इंसानियत की सारी हदें तोड़ दीं। गांव के रामदेव उरांव के बेटे की मौत हुई और दूसरे की तबीयत बिगड़ी। फिर क्या था—गांव वालों ने तय कर लिया कि बाबूलाल उरांव का परिवार ही जिम्मेदार है, क्योंकि वे “काला जादू” करते हैं।

करीब 200-250 लोगों की उन्मादी भीड़ ने रात 3 बजे बाबूलाल उरांव और उनके परिवार के चार और सदस्यों को बेरहमी से पीटा, फिर उन पर डीजल डालकर जिंदा जला दिया और लाशें पोखर में फेंक दीं।

मारे गए लोग थे:

  • बाबूलाल उरांव (62)
  • उनकी पत्नी सीता देवी (60)
  • बेटा मंजीत उरांव (25)
  • बहू रानी देवी (22)
  • बाबूलाल की मां कातो मोसमा (75)

पुलिस ने अब तक 23 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर और 150 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया है। मुख्य आरोपी नकुल कुमार समेत तीन को गिरफ्तार किया गया है। एक नाबालिग लड़का जो इस नरसंहार से किसी तरह बच निकला, उसने ही पुलिस को पूरी कहानी बताई।


डायन कहकर मार देना: नई सोच या पुरानी साजिश?

स्थानीय पत्रकार गौरव पंकज ने बताया कि इस घटना के पीछे एक तांत्रिक का हाथ है। उसी के कहने पर 70 साल की कातो देवी को “डायन” मान लिया गया और पूरे परिवार की बलि चढ़ा दी गई।

दुख की बात ये है कि यह कोई पहली घटना नहीं है, और शायद आखिरी भी नहीं।

2000 से 2021 तक पूरे देश में ‘विच हंटिंग’ के कारण 377 मौतें हुई हैं।
सिर्फ झारखंड में 2001 से 2020 तक 590 लोगों को “डायन” बताकर मार डाला गया। सिविल सोसाइटी का मानना है कि पिछले 20 वर्षों में यह संख्या 1800 से भी ज्यादा है।

इसमें से ज्यादातर महिलाएं दलित समुदाय से थीं।


कानून है—but असर नहीं है

बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान और असम जैसे राज्यों में विच हंटिंग रोकने के लिए कानून बने हुए हैं। बिहार ने 1999 में सबसे पहले कानून बनाया था। लेकिन 2023-24 के एक सर्वे के मुताबिक, बिहार के 85% सरपंचों को इस कानून के बारे में जानकारी ही नहीं है।

और ये तो सिर्फ रिपोर्ट हुए मामलों के आंकड़े हैं। NCRB के मुताबिक, बिहार में केवल 31% विच हंटिंग केस रिपोर्ट होते हैं। यानी हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह है।


डायन क्यों सिर्फ औरत ही होती है?

क्या आपने कभी सुना कि किसी मर्द को “डायन” कहा गया हो?

कभी कोई पुरुष “अपशगुन”, “मनहूस” या “काला जादू” करने वाला क्यों नहीं माना जाता?

क्योंकि मर्दों के लिए महिलाओं के खिलाफ नफरत फैलाना आसान और सुविधाजनक है। अगर किसी औरत ने “ना” कह दिया—तो वो डायन बन जाती है। अगर वो बूढ़ी है और अकेली—तो चुड़ैल। अगर उसके पति की मौत हो गई—तो मनहूस

ये खेल सिर्फ अंधविश्वास का नहीं है। यह सत्ता, बदले और संपत्ति की लड़ाई है।


लेकिन उम्मीद भी है—जैसे छुटनी महतो और बिरूला रभा

छुटनी महतो, झारखंड की रहने वाली, खुद 1995 में विच हंटिंग का शिकार हुई थीं। आज वो दर्जनों ऐसी महिलाओं की आवाज बन चुकी हैं जिन्हें समाज ने डायन करार दिया था। उन्हें 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

बिरूला रभा, असम की एक और महिला, समाज से लड़ीं और आज औरों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं।


अब सवाल आपसे है—क्या हम चुप रहेंगे?

पूर्णिया की घटना सिर्फ एक गांव की त्रासदी नहीं है। यह हमारे पूरे समाज की विफलता है।

जब अगली बार आपके मोहल्ले, गांव या घर में किसी महिला को “डायन” कहकर ताने मारे जाएं, तो एक बार जरूर सोचिए—क्या हम भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गए हैं जो इंसानियत को जलाकर राख कर रही है?

अंधविश्वास इसलिए “अंधा” होता है क्योंकि वो देखने की ताकत छीन लेता है।

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