इंदौर-उज्जैन मेट्रो प्रोजेक्ट: 10 हजार करोड़ की लागत, 45 किमी ट्रैक पर 11 स्टेशन

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इंदौर-उज्जैन मेट्रो प्रोजेक्ट: 10 हजार करोड़ की लागत, 45 किमी ट्रैक पर 11 स्टेशन

इंदौर से उज्जैन के बीच मेट्रो रेल चलाने की योजना अब तेज़ी से आगे बढ़ रही है। इस प्रोजेक्ट की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार हो चुकी है और जल्द ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इसका रिव्यू करेंगे। इसके बाद इसे कैबिनेट में रखा जाएगा।

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने इस परियोजना की फिजिबिलिटी स्टडी और डीपीआर तैयार की है। अनुमानित लागत लगभग 10 हजार करोड़ रुपए है।


मेट्रो प्रोजेक्ट की खास बातें

  • लंबाई: 45 किलोमीटर
  • स्टेशन: कुल 11
  • लागत: करीब 10,000 करोड़ रुपए
  • रूट: इंदौर लवकुश नगर से उज्जैन रेलवे स्टेशन तक
  • यात्रा समय: मात्र 45–50 मिनट
  • अधिकतम स्पीड: 135 किमी प्रति घंटा
  • ट्रैक: हाइब्रिड मोड – एलिवेटेड और अंडरग्राउंड दोनों

उज्जैन तक यात्रा अब होगी आसान

अभी इंदौर से उज्जैन बस से जाने में लगभग 2 घंटे, कार से 1.5 घंटे, लेकिन मेट्रो शुरू होने पर यह सफर सिर्फ 50 मिनट में पूरा हो सकेगा।

इससे खासतौर पर महाकाल मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को बड़ा फायदा मिलेगा।


कहां-कहां बनेंगे मेट्रो स्टेशन?

डीपीआर के अनुसार, इन 11 स्थानों पर स्टेशन प्रस्तावित हैं:

  1. भौंरासला
  2. बारोली
  3. धरमपुरी
  4. तराना
  5. सांवेर
  6. पंथ पिपलई
  7. निनोरा
  8. त्रिवेणी घाट
  9. नानाखेड़ा
  10. उज्जैन ISBT
  11. उज्जैन रेलवे स्टेशन

उज्जैन शहर में लगभग 4.5 किमी का ट्रैक अंडरग्राउंड रखा जाएगा।


डिपो और जमीन की चुनौती

  • इंदौर में पहले से मेट्रो का संचालन हो रहा है, इसलिए यहां नए डिपो की जरूरत नहीं है।
  • उज्जैन के आसपास 49.7 एकड़ सरकारी जमीन नहीं मिली, इसलिए सांवेर के पास रेवती गांव में डिपो के लिए जमीन मांगी गई है।

क्यों जरूरी है यह मेट्रो?

  • इंदौर और उज्जैन के बीच रोज़ाना हजारों लोग अप-डाउन करते हैं।
  • करीब 75% यातायात सड़क मार्ग से होता है, जिससे जाम और हादसों की स्थिति बनती है।
  • मेट्रो शुरू होने पर ट्रैफिक का दबाव लगभग एक-तिहाई रह जाएगा।

कब तक पूरी होगी परियोजना?

अधिकारियों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में कम से कम 3 साल लगेंगे। इसका मतलब है कि यह सिंहस्थ 2028 से पहले शुरू होना मुश्किल है।


इंदौर-उज्जैन मेट्रो प्रोजेक्ट दोनों शहरों की कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई देगा। यह न सिर्फ समय और ईंधन की बचत करेगा, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं और ट्रैफिक दबाव को भी काफी कम करेगा। हालांकि, 10 हजार करोड़ रुपए की भारी लागत और जमीन अधिग्रहण अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

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