ईरान की हार से भारत पर क्या असर पड़ेगा? जानिए पूरी कहानी

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ईरान-इसराइल युद्ध

ईरान और इसराइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने न केवल मध्य पूर्व में अस्थिरता फैलाई है, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी नई विदेश नीति चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इस टकराव में अगर ईरान कमजोर पड़ता है या हारता है, तो क्या भारत की वैश्विक रणनीति और कूटनीतिक संतुलन प्रभावित होगा?

📜 भारत-ईरान: ऐतिहासिक और कूटनीतिक रिश्तों की झलक

  • 1947 से पहले: भारत और ईरान 905 किमी लंबी सीमाएँ साझा करते थे।
  • 1950 में: भारत ने ईरान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध बनाए।
  • 1993 में: तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव ने ईरान की यात्रा की, उससे पहले उन्होंने इसराइल से भी रिश्ते जोड़े थे।
  • वर्तमान में: भारत का झुकाव इसराइल की ओर अधिक दिखाई दे रहा है।

🌍 बहुध्रुवीय दुनिया बनाम एकध्रुवीय व्यवस्था

भारत हमेशा बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था (Multipolar World Order) की वकालत करता रहा है, जहां किसी एक देश का वर्चस्व न हो। लेकिन अगर पश्चिम एशिया में ईरान हारता है और इसराइल-अमेरिका का दबदबा बढ़ता है, तो भारत की यह रणनीति कमज़ोर हो सकती है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा (JNU):

“ईरान की हार बहुध्रुवीय दुनिया की कल्पना को चोट पहुंचाएगी। हालांकि अमेरिका यहां प्रभुत्व नहीं जमा पाएगा क्योंकि पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिक्स बेहद जटिल है।”

तलमीज़ अहमद (पूर्व राजदूत):

“भारत का स्टैंड अस्पष्ट है। सरकार की दिलचस्पी घरेलू राजनीति में अधिक है, विदेश नीति के प्रति गंभीरता की कमी दिखती है।”

🇮🇷 भारत के लिए ईरान क्यों अहम है?

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी तेल और गैस की ज़रूरतों के लिए लंबे समय तक ईरान पर निर्भर रहा है।
  • चाबहार पोर्ट: अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण।
  • डायस्पोरा: पश्चिम एशिया में 90 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं और अरबों डॉलर भेजते हैं।

🤝 भारत-इसराइल बढ़ते रिश्ते

  • पिछले 10 वर्षों में भारत और इसराइल के संबंध गहरे हुए हैं।
  • इसराइल, भारत का अहम रक्षा साझेदार बन चुका है।
  • रक्षा, कृषि और साइबर सिक्योरिटी में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

डॉ. मुदस्सिर क़मर (JNU):

“भारत ईरान से ज़्यादा इसराइल को प्राथमिकता दे रहा है क्योंकि इसराइल रणनीतिक और सैन्य साझेदारी में अधिक मददगार है।”

⚖️ भारत की संतुलन नीति और चुनौतियाँ

भारत अक्सर टकराव की स्थिति में ‘निंदा से परहेज़’ करता आया है — चाहे वह सोवियत संघ का हस्तक्षेप हो या अमेरिका का इराक़ पर हमला। इस बार भी भारत ने इसराइल द्वारा ईरान पर हमले की आलोचना नहीं की, जिससे भारत की ‘संतुलन नीति’ पर सवाल उठ रहे हैं।

🇮🇳 भारत की विदेश नीति पर राजनीति का असर?

शिवशंकर मेनन (पूर्व एनएसए):

“भारत की विदेश नीति अब घरेलू राजनीति से प्रभावित हो रही है, जो राष्ट्रीय हितों के लिए घातक हो सकता है।”

प्रमुख सवाल

  • क्या ईरान की हार भारत की बहुध्रुवीय दुनिया की सोच को कमज़ोर कर देगी?
  • क्या इसराइल से बढ़ते रिश्ते भारत को वैश्विक दक्षिण से दूर ले जाएंगे?
  • क्या भारत की ‘निंदा न करने’ वाली रणनीति अब प्रभावहीन हो गई है?

📉 भारत-ईरान व्यापार का गिरता ग्राफ

  • ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर दिया।
  • 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार घटकर एक अरब डॉलर से भी नीचे आ चुका है।
  • चाबहार परियोजना पर भी कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

💬 निष्कर्ष: क्या भारत को रणनीति बदलनी होगी?

ईरान अगर इसराइल से हार जाता है तो यह भारत की विदेश नीति और वैश्विक दृष्टिकोण के लिए एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। भारत को संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा, ताकि वह पश्चिम एशिया में अपनी स्थिति और हितों को सुरक्षित रख सके।

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