India-EU Trade Deal: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर जल्द हस्ताक्षर होने की तैयारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिसंबर में ब्रुसेल्स दौरे के दौरान इस समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। हालांकि, व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिशों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर भारत और यूरोपीय संघ के बीच मतभेद बने हुए हैं।
तुर्किये में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन COP31 से पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारत का रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) सहित व्यापार और उत्पादन लागत से जुड़े प्रतिबंधों का विरोध जारी रखेगा। भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर विकासशील देशों के व्यापार और आर्थिक हितों पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
India-EU Trade Deal: भारत के हितों की रक्षा के लिए CBAM का विरोध जारी रहेगा
COP31 से पहले मीडिया से बातचीत में पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों में लागत, बौद्धिक संपदा अधिकार और व्यापारिक बाधाओं जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी है। उनके मुताबिक, इस तरह के प्रतिबंध छोटे और विकासशील देशों के लिए स्वच्छ एवं आधुनिक तकनीक तक पहुंच को मुश्किल बना सकते हैं।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि कार्बन बाजारों में किसी भी देश की भागीदारी स्वैच्छिक होनी चाहिए। भारत ऐसे किसी भी प्रावधान को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है, जो देशों पर अनावश्यक आर्थिक या व्यापारिक दबाव पैदा करे।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म को लेकर भारत का रुख पहले जैसा ही रहेगा। जब भी देश के आर्थिक और व्यापारिक हितों की बात आएगी, भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से अपनी बात रखेगा।
India-EU Trade Deal: क्या है CBAM, जिस पर भारत और यूरोपीय संघ में मतभेद?
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM यूरोपीय संघ की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत यूरोप में आयात होने वाले कुछ उत्पादों पर उनके निर्माण के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर अतिरिक्त लागत लागू होती है। इसका उद्देश्य आयातित वस्तुओं के कार्बन उत्सर्जन की कीमत तय करना है।
यूरोपीय संघ का तर्क है कि इस व्यवस्था से उसके घरेलू उद्योगों को उन देशों की कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में समान अवसर मिलेंगे, जहां कार्बन उत्सर्जन पर अपेक्षाकृत कम सख्ती है। यूरोपीय कंपनियों को अपने उत्पादन के दौरान उत्सर्जन घटाने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। ऐसे में आयातित उत्पादों पर भी कार्बन की लागत लागू करने की बात कही गई है।
हालांकि, भारत सहित कई विकासशील देशों को आशंका है कि CBAM के कारण उनके उत्पादों की यूरोपीय बाजार में कीमत बढ़ सकती है। इससे निर्यात प्रभावित होने के साथ-साथ घरेलू उद्योगों पर भी अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है।
भारत के लोहा और इस्पात, सीमेंट, एल्युमीनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों पर इस व्यवस्था का असर पड़ने की आशंका है। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार करती हैं। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन के आधार पर लगने वाली अतिरिक्त लागत उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
India-EU Trade Deal: COP31 में विकासशील देशों की ओर से उठेगा यह मुद्दा
COP31 में CBAM को लेकर यूरोपीय संघ और विकासशील देशों के बीच मतभेद प्रमुख चर्चा का विषय बन सकते हैं। G77 और BASIC जैसे समूह पहले भी जलवायु परिवर्तन के नाम पर लगाए जाने वाले एकतरफा व्यापारिक प्रतिबंधों, जलवायु वित्त और ऊर्जा बदलाव में समानता जैसे मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते रहे हैं।
भारत इन दोनों समूहों का हिस्सा है। विकासशील देशों का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन इसके लिए अपनाए जाने वाले नियमों में उनकी आर्थिक स्थिति और विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इस बीच यूरोपीय आयोग भी 17 नवंबर को COP31 के दौरान CBAM पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित करेगा। इसका शीर्षक ‘The State of the EU CBAM: What makes CBAM a success?’ रखा गया है। इस कार्यक्रम में यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा व्यवस्था और उससे जुड़े पहलुओं पर चर्चा होगी।
India-EU Trade Deal: स्वच्छ ऊर्जा को लेकर भी भारत अपना अलग रुख रख सकता है
COP31 में स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी एक अहम मुद्दा रहने वाला है। सम्मेलन की मेजबानी कर रहा तुर्किये वैश्विक ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाने की पहल कर रहा है। इसके तहत मौजूदा 23 प्रतिशत हिस्सेदारी को वर्ष 2035 तक बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है।
इस पहल का उद्देश्य गैर-जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना और ऊर्जा क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करना है। हालांकि, भारत इस तरह के वैश्विक लक्ष्यों को लागू करने के तरीके को लेकर सावधानी बरतने के पक्ष में है।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि COP31 की अध्यक्षता से जुड़ी स्वैच्छिक पहलों को औपचारिक जलवायु वार्ताओं से अलग रखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि किसी भी वैश्विक लक्ष्य को तय करते समय सभी देशों की परिस्थितियों, क्षमताओं और जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है।
भारत का जोर इस बात पर है कि विकसित और विकासशील देशों पर एक जैसे लक्ष्य या नियम लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा। अलग-अलग देशों की ऊर्जा जरूरतें, आर्थिक स्थिति और विकास की प्राथमिकताएं अलग हैं। इसलिए जलवायु नीतियां बनाते समय इन अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
India-EU Trade Deal: जलवायु वित्त पर विकसित देशों से जवाबदेही की मांग करेगा भारत
भूपेंद्र यादव के मुताबिक, COP31 में भारत विभिन्न देशों के बीच सहमति बनाने और ठोस परिणाम हासिल करने की कोशिश करेगा। भारत चाहता है कि जलवायु सम्मेलन केवल घोषणाओं और वादों तक सीमित न रहे, बल्कि उन फैसलों को लागू करने के लिए जरूरी संसाधन और सहयोग भी सुनिश्चित किया जाए।
इस दौरान जलवायु वित्त का मुद्दा भी भारत की प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। मंत्री ने कहा कि विकसित देशों को पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकासशील देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
भारत की मांग है कि यह सहायता अनुमानित, मुख्य रूप से सार्वजनिक स्रोतों से और रियायती शर्तों पर उपलब्ध कराई जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को आर्थिक मदद तो मिले, लेकिन उन्हें इसके बदले कर्ज के अतिरिक्त बोझ का सामना न करना पड़े।
विकासशील देशों का मानना है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव, जलवायु आपदाओं से निपटने और उत्सर्जन कम करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत है। ऐसे में विकसित देशों को वित्तीय और तकनीकी सहयोग की अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए।
India-EU Trade Deal: कब और कहां आयोजित होगा COP31?
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP31 का आयोजन 9 से 20 नवंबर तक तुर्किये के अंताल्या शहर में किया जाएगा। इस बार तुर्किये सम्मेलन की मेजबानी और अध्यक्षता करेगा, जबकि ऑस्ट्रेलिया वार्ताओं की अध्यक्षता से जुड़ी भूमिका निभाएगा।
सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई अहम विषयों पर चर्चा होगी। इनमें स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु वित्त, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और विकासशील देशों की जरूरतें प्रमुख रहेंगी। भारत और स्वीडन के बीच LeadIT 3.0 पहल से जुड़ा कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा।
इसके अलावा तटीय क्षेत्रों की जलवायु सुरक्षा, इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस और वन संरक्षण जैसे विषयों पर भी उच्चस्तरीय कार्यक्रम होंगे। भारत की कोशिश रहेगी कि इन चर्चाओं में विकासशील देशों के हितों को प्रमुखता मिले।
India-EU Trade Deal: भारत-EU FTA के बीच जलवायु मुद्दों पर बनी रहेगी चुनौती
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर बातचीत दोनों पक्षों के आर्थिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस समझौते से व्यापार और निवेश के नए अवसर खुलने की उम्मीद है। हालांकि, CBAM जैसे मुद्दे दोनों पक्षों के बीच नीतिगत मतभेद को भी सामने ला रहे हैं।
भारत एक ओर यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अपने उद्योगों और निर्यातकों के हितों से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। COP31 में भारत का रुख इसी प्राथमिकता को दर्शाएगा। जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों में सहयोग के साथ-साथ भारत विकासशील देशों के लिए समान अवसर, सस्ती तकनीक और पर्याप्त वित्तीय सहायता की मांग भी उठाता रहेगा।


