Hari Giri Ji Maharaj : दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर को भी तीर्थ का दर्जा, स्वामी चक्रपाणि नंद गिरि जी महाराज ने संकल्प का किया स्वागत; हजारों संत-महात्मा रहे मौजूद
Hari Giri Ji Maharaj : नई दिल्ली। भगवान महर्षि वाल्मीकि जी के प्रकटोत्सव पर दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित भगवान श्री वाल्मीकि मंदिर धाम में भव्य धार्मिक आयोजन किया गया। इस अवसर पर देशभर से हजारों संत-महात्मा, धर्माचार्य, महामंडलेश्वर और श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रम में अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं जगतगुरु स्वामी चक्रपाणि नंद गिरि जी महाराज भी उपस्थित रहे।
आयोजन के दौरान श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े के मुख्य संरक्षक पूज्य हरि गिरि जी महाराज ने महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि देशभर में भगवान महर्षि वाल्मीकि जी के नाम पर तीर्थ और धाम स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने मंदिर मार्ग स्थित भगवान श्री वाल्मीकि मंदिर को भी तीर्थ घोषित किया। इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े की ओर से पूर्ण सहयोग देने की बात भी कही। पूज्य हरि गिरि जी महाराज ने महर्षि वाल्मीकि के जीवन, तपस्या, ज्ञान और रामायण के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने पर जोर दिया।
Hari Giri Ji Maharaj : हरि गिरि जी महाराज के संकल्प का स्वामी चक्रपाणि ने किया स्वागत
जगतगुरु स्वामी चक्रपाणि नंद गिरि जी महाराज ने पूज्य हरि गिरि जी महाराज का अभिनंदन करते हुए उनकी घोषणा को महत्वपूर्ण संकल्प बताया। उन्होंने कहा कि हरि गिरि जी महाराज की उपस्थिति किसी एक समाज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके माध्यम से सनातन धर्म, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का संदेश भी प्रसारित होता है।
स्वामी चक्रपाणि ने कहा कि संत समाज की जिम्मेदारी समाज को जोड़ना, सनातन संस्कृति को मजबूत करना और देश की एकता एवं अखंडता के लिए काम करना है। उन्होंने आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में संत समाज को मार्गदर्शन देने वाले प्रमुख संतों में पूज्य हरि गिरि जी महाराज का विशिष्ट स्थान है।
उन्होंने देशभर में महर्षि वाल्मीकि के तीर्थ और धाम स्थापित करने की पहल में पूरा सहयोग देने का संकल्प भी व्यक्त किया।
रामायण के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि ने दिया मानवता को संदेश
स्वामी चक्रपाणि नंद गिरि जी महाराज ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों और शिक्षाओं को अपनाकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दिया जाना चाहिए। उनकी रचित रामायण में मर्यादा, धर्म, कर्तव्य, आदर्श परिवार और सामाजिक समरसता जैसे जीवन मूल्यों का संदेश मिलता है।
उन्होंने कहा कि रामायण पर अनेक ग्रंथों और व्याख्याओं की रचना हुई है, लेकिन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की मूल रामायण का स्थान विशेष है। उनकी शिक्षाएं आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रही हैं।
स्वामी चक्रपाणि ने मंदिर धाम में की गई व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए आयोजन से जुड़े कार्यकर्ताओं, सेवादारों और श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने जगतगुरु श्री कृष्ण शाह विद्यार्थी शाह जी महाराज के अनुयायियों की सेवा भावना और संतों के सम्मान के प्रति समर्पण की भी प्रशंसा की।
Hari Giri Ji Maharaj : संतों ने मंदिर के पीठाधीश्वर को किया सम्मानित
कार्यक्रम में उपस्थित संत-महात्माओं ने भगवान वाल्मीकि मंदिर धाम के पीठाधीश्वर जगतगुरु श्री कृष्ण शाह विद्यार्थी शाह जी महाराज को सामूहिक रूप से सम्मानित किया। संतों ने उनके धार्मिक और आध्यात्मिक योगदान के साथ मंदिर धाम की सेवा में उनकी भूमिका की सराहना की।
आयोजन के प्रमुख व्यवस्थापक ज्ञानी जी को भी संतों ने आशीर्वाद और शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और सेवा कार्यों में जुटे अन्य पदाधिकारियों, सदस्यों और सेवादारों के प्रयासों की भी प्रशंसा की गई।
इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत नारायण गिरि जी महाराज ने महर्षि वाल्मीकि के आध्यात्मिक योगदान और सामाजिक समरसता के संदेश पर विचार रखे। स्वामी आनंदेश्वर जी महाराज ने संतों के बताए मार्ग पर चलते हुए सनातन धर्म की सेवा करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का संचालन श्री नवल किशोर दास जी महाराज ने किया। अध्यक्षता कर रहे जगतगुरु श्री कृष्ण शाह विद्यार्थी शाह जी महाराज ने सभी संतों, अतिथियों और श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
Hari Giri Ji Maharaj : हिंदू महासभा भवन से मंदिर धाम तक पहुंचे संत और श्रद्धालु
आयोजन से पहले पूज्य हरि गिरि जी महाराज के नेतृत्व में संतों और श्रद्धालुओं का समूह मंदिर मार्ग स्थित हिंदू महासभा भवन से भगवान श्री वाल्मीकि मंदिर धाम पहुंचा। यहां सभी ने महर्षि वाल्मीकि के श्रीचरणों में नमन किया और मंदिर परिसर में दंडवत प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस आयोजन में आचार्य विवेक मुनि जी, स्वामी गिरीशानंद जी महाराज, त्रिलोचन दास जी महाराज सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों संत-महात्मा शामिल हुए। भगवान महर्षि वाल्मीकि के प्रकटोत्सव पर आयोजित यह कार्यक्रम संत परंपरा के सम्मान, धार्मिक विरासत के संरक्षण और सामाजिक समरसता के संदेश को आगे बढ़ाने के संकल्प के रूप में सामने आया।
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