BY: Yoganand Shrivastva
NCLT देश में कंपनियों के दिवालिया मामलों और कॉरपोरेट विवादों का निपटारा करने वाले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और इसकी अपीलीय संस्था NCLAT को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। संविदा कर्मचारियों की भर्ती का जिम्मा निजी एजेंसी को सौंपने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि मंत्रालय ने न्यायिक संस्था पर कब्जा कर लिया है और उसे हाईजैक कर लिया है।
क्या है पूरा विवाद?
NCLT मामले की शुरुआत NCLT और NCLAT में वर्षों से संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों की याचिका से हुई। ये कर्मचारी कोर्ट मास्टर, स्टेनोग्राफर, असिस्टेंट रजिस्ट्रार और अन्य तकनीकी पदों पर कार्यरत हैं। कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि इनकी नियुक्ति कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने ही संविदा के आधार पर की थी।
कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय तक सेवा देने के बावजूद उन्हें मकान किराया भत्ता और दैनिक भत्ते जैसी सुविधाएं नहीं मिलीं। अब मंत्रालय ने भर्ती का काम एक निजी एजेंसी को सौंप दिया है। इससे उन्हें आशंका है कि एक या दो नवंबर से उन्हें हटाकर निजी एजेंसी के नए कर्मचारियों को नियुक्त किया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, भर्ती नियमों और शुरुआती विज्ञापनों में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने का प्रावधान था। ऐसे में वर्षों की सेवा के बाद उन्हें अचानक हटाना मनमाना फैसला होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकार से भी जोड़ा।
न्यायिक स्वतंत्रता और गोपनीयता पर चिंता
NCLT कर्मचारियों की ओर से अदालत में यह आशंका जताई गई कि न्यायिक कार्यवाही से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज और रिकॉर्ड संभालने वाले कर्मचारियों को निजी कंपनी के माध्यम से नियुक्त करना उचित नहीं है।
NCLT में देश की बड़ी कंपनियों और बैंकों से जुड़े दिवालिया मामलों की सुनवाई होती है। ऐसे में अदालती रिकॉर्ड और फैसलों से संबंधित दस्तावेजों तक निजी एजेंसी के कर्मचारियों की पहुंच न्यायिक गोपनीयता और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के निर्णय के बिना किसी भी कर्मचारी को नौकरी से न हटाया जाए।
CJI सूर्यकांत ने मंत्रालय की भूमिका पर उठाए सवाल
NCLT सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने निजी ठेकेदारों के जरिए कर्मचारियों की नियुक्ति पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि ठेकेदार किस तरह के तरीके अपनाते हैं और ऐसे लोगों को न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की परवाह नहीं होती।
सीजेआई ने टिप्पणी की कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का अधिकरण पर पूरा नियंत्रण हो गया है। उन्होंने इसे न्यायिक संस्था की स्वायत्तता में दखल बताते हुए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति करार दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने पुराने न्यायिक अनुभव का जिक्र करते हुए मुंबई की एक घटना भी बताई। उनके मुताबिक, वहां संविदा पर रखे गए कर्मचारी ट्रिब्यूनल की मूल अदालती रिपोर्ट लेकर फरार हो गए थे, जिसके बाद पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करानी पड़ी थी।
निजी ठेका व्यवस्था खत्म करने और स्थायी भर्ती का सुझाव
NCLT सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संविदा आधारित नियुक्तियों की मौजूदा व्यवस्था का समर्थन नहीं करता। सीजेआई ने कहा कि अदालत किसी व्यक्तिगत हित वाली याचिका के आधार पर ट्रिब्यूनल का कामकाज नहीं रोकेगी, लेकिन संस्था के व्यापक हित को देखते हुए कदम उठाए जा सकते हैं।
पीठ ने निजी कंपनी के ठेके को समाप्त करने और भर्ती व्यवस्था में सुधार की बात कही। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया किसी एजेंसी के माध्यम से कराई जा सकती है, लेकिन नियुक्त कर्मचारियों और ट्रिब्यूनल के बीच सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध होना चाहिए, ताकि जवाबदेही बनी रहे।
अदालत ने तत्काल जरूरतों के लिए सरकारी विभागों से अनुभवी अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाने और दीर्घकालीन व्यवस्था के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) के माध्यम से नियमित एवं पारदर्शी भर्ती करने का सुझाव दिया।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर न्यायिक संस्थाओं की प्रशासनिक स्वायत्तता, कर्मचारियों की जवाबदेही और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।


