BY: Yoganand Shrivastva
Marital Rape केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक बलात्कार यानी Marital Rape को अपराध घोषित करने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि इसे आपराधिक अपराध बनाने का फैसला संसद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार की ओर से कहा गया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को कानून बनाने की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। वहीं, सुनवाई के दौरान अदालत ने महिलाओं की सहमति और उनकी सुरक्षा से जुड़े कई अहम सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई तीन सप्ताह बाद करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले को बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
केंद्र ने कहा- कानून बनाना संसद का अधिकार
Marital Rape केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने दलील रखी कि वैवाहिक बलात्कार को अलग अपराध घोषित करना विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर नया आपराधिक कानून बनाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
मामले में चुनौती भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के Exception 2 को दी गई है। यह प्रावधान पुराने IPC की धारा 375 में मौजूद वैवाहिक बलात्कार संबंधी अपवाद को आगे बढ़ाता है। इसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा किए गए यौन संबंध को रेप की श्रेणी से बाहर रखा गया है।
केंद्र पहले ही अपने हलफनामे में कह चुका है कि वह वैवाहिक बलात्कार को अलग आपराधिक अपराध बनाए जाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का तर्क है कि ऐसा करने से विवाह संस्था और वैवाहिक रिश्तों की स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
जस्टिस बागची ने उठाया सहमति का सवाल
Marital Rape सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने महिला की सहमति और उसकी सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ शादी के भीतर यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वह निश्चित रूप से पीड़ित है।
जस्टिस बागची ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति को राज्य कानून की नजर में रेप मानता है या नहीं। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि शादी का मतलब किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समाप्त हो जाना नहीं हो सकता।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने भी दलील दी कि विवाह का रिश्ता पति को पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने की छूट नहीं देता। उनका कहना था कि यदि पति पत्नी को गंभीर चोट पहुंचाता है, तो केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर उसे कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
2022 में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला रहा था विभाजित
Marital Rape इस मामले की जड़ भारतीय दंड संहिता में मौजूद वैवाहिक बलात्कार के अपवाद से जुड़ी है, जिसे अब BNS में भी बनाए रखा गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पत्नी की सहमति के बिना यौन संबंध को केवल इसलिए अलग कानूनी दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि आरोपी उसका पति है।
वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि वैवाहिक संबंधों में होने वाले ऐसे मामलों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं और हर मामले को सामान्य रेप के अपराध के बराबर मानना उचित नहीं होगा।
इस मुद्दे पर वर्ष 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट में भी अलग-अलग राय सामने आई थी। अदालत का फैसला विभाजित रहने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा मौजूदा अपवाद संवैधानिक कसौटी पर सही है या नहीं और इसके बावजूद किन परिस्थितियों में कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। मामले की अगली विस्तृत सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।


