Rain Waterlogging : बारिश का मौसम आते ही शहर की खूबसूरती बदल जाती है। पेड़-पौधे धुल जाते हैं, मौसम सुहाना हो जाता है और सड़कें… सड़कें भी अपनी नई पहचान बना लेती हैं। पहले जहां सड़क हुआ करती थी, वहां अब पानी दिखाई देता है। कहीं घुटने तक पानी, कहीं कमर तक पानी और कहीं इतना पानी कि आदमी सड़क पर नहीं, अपने भविष्य में तैरता हुआ नजर आता है।
अब राहगीर भी परेशान होकर पूछता है, “भैया, ये सड़क है या स्विमिंग पूल?”
जवाब मिलता है, “नगरपालिका से पूछिए, उन्होंने बनाया है… कुछ तो सोचकर बनाया होगा!”
Rain Waterlogging : सड़क खोजो अभियान
बारिश शुरू होते ही शहर में एक नया अभियान चल पड़ता है—“अपनी सड़क खुद खोजिए।”
सुबह घर से निकलते समय सड़क बिल्कुल ठीक दिखाई देती है। पांच मिनट बाद बारिश होती है और सड़क पानी के अंदर चली जाती है।
अब वाहन चालक का काम ड्राइविंग नहीं, पुरातत्व विभाग जैसा हो जाता है। कहां गड्ढा है, कहां नाली है, कहां सड़क है और कहां सड़क के नाम पर सिर्फ पानी है, यह सब अनुभव से पता चलता है। नए ड्राइवर सड़क पर गाड़ी चलाते हैं। पुराने ड्राइवर पानी देखकर ही समझ जाते हैं।
“यहां जरूर कोई गड्ढा है, धीरे चलो।”
Rain Waterlogging : गड्ढे भी अब आत्मनिर्भर
शहर के गड्ढों ने भी समय के साथ तरक्की कर ली है। पहले वे छोटे हुआ करते थे। बारिश आते ही उनका विस्तार हो जाता है। एक गड्ढा इतना बड़ा हो जाता है कि उसमें छोटा-मोटा तालाब विकसित हो जाए।
नगरपालिका अगर पूछे, “गड्ढा कहां है?”
जनता कहे, “जहां सड़क दिखाई नहीं दे रही, समझ जाइए वहीं है।”
कुछ गड्ढे तो इतने पुराने हैं कि मोहल्ले के बच्चों को उनकी लोकेशन विरासत में मिली है।
बच्चा पिता से पूछता है, पापा, स्कूल कैसे जाऊं?”
पिता कहते हैं, “बेटा, बाएं वाला गड्ढा पार करना, फिर दाएं वाला तालाब… उसके बाद जो रास्ता दिखे, वही सड़क है।”

Rain Waterlogging : बारिश में कार नहीं, नाव चाहिए
शहर में बारिश के बाद सबसे ज्यादा मांग किस चीज की होती है?
छाता? नहीं।
रेनकोट? नहीं।
नाव!
कई जगह हालात ऐसे हो जाते हैं कि बाइक वाले हेलमेट से ज्यादा पानी से बचने की चिंता करते हैं।
कार चालक भी सोचता है—
“गाड़ी निकालूं या नाव मंगाऊं?”
एक साहब ने पानी देखकर पत्नी से कहा—
“आज ऑफिस नहीं जाऊंगा।”
पत्नी बोली—“क्यों?”
साहब बोले—
“रास्ते में सड़क नहीं है। ऑफिस पहुंचने के लिए पहले तैराकी सीखनी पड़ेगी।”
नगरपालिका का अपना मौसम विज्ञान
नगरपालिका के अधिकारियों का बारिश को देखने का नजरिया भी अलग होता है।
जनता कहती है—“सड़क पर पानी भर गया।”
अधिकारी कहते हैं—
“अभूतपूर्व बारिश हुई है।”
जनता पूछती है—“नाली क्यों नहीं साफ हुई?”
जवाब—
“नालियां साफ की गई थीं।”
जनता पूछती है—“फिर पानी निकला क्यों नहीं?”
जवाब—
“बारिश बहुत ज्यादा थी।”
यानी बारिश ज्यादा हो तो पानी भरना स्वाभाविक, बारिश कम हो तो भी पानी भरना स्वाभाविक।
नागरिक आखिर में पूछता है—
“फिर सड़क कब दिखेगी?”
जवाब आता है—
“बारिश बंद होने के बाद।”
सड़क पर मुफ्त एडवेंचर
आजकल शहर में मनोरंजन के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं। बारिश में बस बाइक उठाइए और सड़क पर निकल जाइए।
हर दस मीटर पर नया रोमांच।
कहीं अचानक गड्ढा, कहीं पानी का झटका, कहीं खुला मैनहोल और कहीं सामने से आती गाड़ी का पानी—एक टिकट में पूरा एडवेंचर पैकेज!
बाइक चालक आगे से सूखा निकलने की कोशिश करता है और पीछे से कोई कार ऐसा पानी उछाल देती है कि लगता है जैसे नगरपालिका ने मुफ्त में “वॉटर स्प्रे शो” आयोजित किया हो।
Rain Waterlogging : अब शहर को नई पहचान चाहिए
शहर में पर्यटन बढ़ाने की योजनाएं बनती हैं। नए पार्क, नई सड़कें, नए विकास कार्य।
लेकिन बारिश आते ही शहर का सबसे बड़ा पर्यटन स्थल बन जाता है—मुख्य सड़क का चौराहा।
लोग बच्चों को दिखाने ले जाते हैं—
“देखो बेटा, यही वो सड़क है जहां गर्मियों में धूल उड़ती थी और बरसात में मछलियां तैरती हैं।”
बच्चा पूछता है—
“पापा, यहां सड़क कब बनेगी?”
पिता कहते हैं—
“बेटा, सड़क बनी हुई है… बस अभी पानी के अंदर है।”
और आखिर में…
बारिश प्रकृति की खूबसूरत सौगात है। समस्या बारिश नहीं, समस्या है बारिश के पानी को रास्ता न मिलना।
शहर की सड़कें अगर हर साल तालाब बन जाएं तो सवाल बादलों से नहीं, व्यवस्था से होना चाहिए।
क्योंकि जनता को सड़क चाहिए, स्विमिंग पूल नहीं।
और अगर नगरपालिका सचमुच स्विमिंग पूल ही बनाना चाहती है तो एक बोर्ड भी लगा दे—
“नगरपालिका द्वारा निर्मित अस्थायी स्विमिंग पूल। प्रवेश निशुल्क। तैरना अपने जोखिम पर। सड़क गर्मी में वापस मिलेगी!”
तब कम से कम जनता बारिश में सड़क खोजने के बजाय टिकट लेकर तैरने जरूर आ जाएगी!




