रिपोर्ट- चन्द्रकान्त पारगीर, एडिट- विजय नंदन
कोरिया: ज़िले के बैकुंठपुर से महज़ 35 किलोमीटर दूर स्थित रावतसरई ग्राम पंचायत के स्कूलपारा मोहल्ले में बीते दो महीने से घना अंधेरा छाया हुआ है। इस गांव में मुख्य रूप से संरक्षित जनजाति पंडो और गोंड आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं, लेकिन सौर ऊर्जा से चलने वाली बिजली व्यवस्था की बैटरी खराब होने के बाद से ठप पड़ी है।
सरकारी दावों और योजनाओं के बावजूद, यहां के ग्रामीण दिन में मोबाइल चार्ज कर रात में उसी की रोशनी में गुज़ारा करने को मजबूर हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित बच्चे हैं, जिन्हें मोबाइल की टॉर्च के सहारे अपनी पढ़ाई करनी पड़ रही है।

कागज़ों में सिमटी ‘ग्रामीण विद्युतीकरण’ की हकीकत
यह घटना ग्रामीण विद्युतीकरण के सरकारी दावों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। जहां पंडो और गोंड जैसी संरक्षित जनजातियां रहती हैं, वहां दो महीने से बिजली न होना और किसी भी अधिकारी का ध्यान इस ओर न जाना स्थानीय प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने इन दूरस्थ क्षेत्रों में बसने वाले आदिवासियों के विकास के लिए जो योजनाएं चलाई हैं, उनकी रोशनी सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित है।
- ग्रामीण: दो महीने हो गए, न कोई देखने आया न कोई सुधारने। रात काटना मुश्किल है।
- ग्रामीण: बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। मोबाइल की लाइट भी कब तक चलेगी।
- ग्रामीण महिला: शाम होते ही डर लगता है। सरकारी योजनाओं का फायदा हमें कब मिलेगा?
- ग्रामीण: हमने कई बार सरपंच और अधिकारियों को बताया, पर कोई सुनवाई नहीं।
सरपंच, ग्राम पंचायत रावतसर ने कहा कि हमने ज़िले के अधिकारियों को इस समस्या से अवगत करा दिया है। सौर ऊर्जा की बैटरी बदलने के लिए फंड और टीम की मांग की गई है, उम्मीद है जल्द समाधान होगा। क्या संरक्षित जनजातियों को भी बुनियादी सुविधा से वंचित रहना पड़ेगा? ज़िला प्रशासन कब इस गंभीर समस्या पर संज्ञान लेगा और रावतसरई के स्कूलपारा को अंधेरे से मुक्ति दिलाएगा?





