जब हिंदू मंदिरों को चर्च समझ बैठा वास्को डि गामा: भारत पहुंचने की पूरी कहानी

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BY: Yoganand Shrivastva

1498 में एक पुर्तगाली नाविक वास्को डि गामा ने समुद्री मार्ग से भारत पहुंचकर एक ऐसा इतिहास रच दिया जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा ही बदल दी। भारत के कालीकट तट पर कदम रखते ही उसकी नजर वहां के मंदिरों और मूर्तियों पर पड़ी। पूजा करते लोगों को देखकर उसने उन्हें ईसाई समझ लिया, क्योंकि मूर्तिपूजा उसके लिए एक नया अनुभव था।

भारत की ओर सफर का इरादा क्यों बना?

15वीं सदी के अंत में यूरोपीय देशों को भारत से मसाले, रेशम और कीमती वस्तुएं सीधे लाने की लालसा थी। ज़मीन के रास्ते व्यापार अरब और वेनिस के व्यापारियों के कब्जे में था, जिससे यूरोप की पहुंच सीमित और महंगी हो गई थी। ऐसे में पुर्तगाल के राजा मैनुएल प्रथम ने भारत के लिए समुद्री रास्ता खोजने का आदेश दिया और इसके लिए वास्को डि गामा को चुना गया।

चार जहाजों के साथ शुरू हुआ ऐतिहासिक सफर

8 जुलाई 1497 को वास्को ने पुर्तगाल के लिस्बन बंदरगाह से चार जहाजों के साथ यात्रा शुरू की:

  1. साओ गैब्रियल (मुख्य जहाज)
  2. साओ राफेल (भाई पाउलो के नेतृत्व में)
  3. बेरियो (छोटा लेकिन तेज जहाज)
  4. एक आपूर्ति जहाज (खाद्य सामग्री से भरा)

करीब 170 यात्रियों के साथ उन्होंने अफ्रीका के चारों ओर घूमते हुए भारत की राह पकड़ी।

यात्रा के प्रमुख पड़ाव

1. केप वर्डे और अटलांटिक महासागर

वास्को ने पश्चिमी अफ्रीका के तट से दूर रहकर लंबा समुद्री रास्ता चुना। इस जोखिम ने उनके दल को कई कठिनाइयों में डाला – खाने-पीने की कमी और बीमारी से कई नाविकों की जान गई।

2. केप ऑफ गुड होप पार करना

नवंबर 1497 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के सबसे खतरनाक समुद्री मोड़ को पार किया। तूफान और लहरों से भरे इस रास्ते ने जहाजों की परीक्षा ली, लेकिन वह इसमें सफल रहे।

3. पूर्वी अफ्रीका में विरोध और समर्थन

मोज़ाम्बिक और मोम्बासा में उन्हें स्थानीय शासकों और अरब व्यापारियों का विरोध झेलना पड़ा। हालांकि मालिंदी में उन्हें एक मित्रवत सुल्तान मिला, जिसने नाविक अहमद इब्न माजिद को भारत तक मार्गदर्शक बनने को कहा।

4. भारत की धरती पर पहला कदम

27 मई 1498 को वास्को कालीकट (वर्तमान कोझिकोड, केरल) पहुंचा। यह पहली बार था जब कोई यूरोपीय समुद्री मार्ग से भारत आया।


कालीकट में मिला अजीब स्वागत

वास्को जब कालीकट पहुंचा, तो वह स्थानीय राजा जमोरिन के दरबार में गया और सस्ते गिफ्ट जैसे कपड़े और टोपी भेंट की। वहां के दरबारी और व्यापारी इन चीजों को देखकर हँस पड़े, क्योंकि वे सोना, चांदी या बहुमूल्य उपहार की अपेक्षा कर रहे थे।

अरब व्यापारी, जो कालीकट के व्यापार पर दशकों से कब्जा जमाए हुए थे, वास्को की उपस्थिति से नाराज थे। उन्होंने जमोरिन को उसके खिलाफ भड़काया। वास्को पर हमले की भी साजिशें हुईं, लेकिन वह सतर्कता से बच निकला।


वास्को की ‘गलतफहमी’: हिंदू = ईसाई?

वास्को को भारत आने से पहले केवल ईसाइयों और मुसलमानों का ही अनुभव था। जब उसने हिंदू मंदिरों में मूर्तिपूजा देखी, तो उसे लगा कि ये लोग किसी अनोखी ईसाई शाखा से संबंध रखते हैं। मंदिरों को चर्च और देवी-देवताओं की मूर्तियों को संतों की मूर्तियाँ समझ बैठा। उसकी यह भ्रांति, भारत की सांस्कृतिक विविधता से उसकी अपरिचितता को दर्शाती है।


यात्रा का अंत: भारी कीमत, ऐतिहासिक लाभ

कालीकट से कुछ मसाले खरीदकर वास्को अपने देश लौट चला। लेकिन यात्रा में बड़ी कीमत चुकानी पड़ी—170 में से केवल 55 यात्री जिंदा बचे, और सिर्फ दो जहाज पुर्तगाल लौट पाए।

लेकिन इस यात्रा ने यूरोप के लिए भारत के नए दरवाजे खोल दिए। इसके बाद पुर्तगाल ने गोवा, दमन और दीव पर अधिकार जमाया। फिर डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज भी आए। भारत के लिए यह यात्रा, विदेशी कब्जे और उपनिवेशवाद की शुरुआत थी।


एक यात्रा जिसने सब कुछ बदल दिया

वास्को डि गामा की भारत यात्रा सिर्फ एक खोज नहीं थी, यह एक ऐतिहासिक मोड़ था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के भाग्य और यूरोपीय विस्तारवाद की दिशा तय कर दी। यह वह क्षण था जब दुनिया छोटी लगने लगी, लेकिन भारत के लिए यह बड़ी चुनौतियों की शुरुआत थी।

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