लेखक: विष्णु गौतम
दुर्ग स्थित केन्द्रीय जेल इन दिनों बदलाव की नई मिसाल पेश कर रहा है। जहां पहले यह जेल केवल सजा काटने की एक जगह मानी जाती थी, वहीं अब यह आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरणादायक प्रशिक्षण केंद्र बनता जा रहा है। जेल अधीक्षक मनीष संभाकर की दूरदर्शिता और सकारात्मक सोच के कारण यह संभव हो पाया है।
यहां बंदियों को रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण देकर उनके जीवन में एक नई उम्मीद की किरण जगाई जा रही है। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल व्यावसायिक कौशल सिखाना नहीं, बल्कि बंदियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना भी है। इसी उद्देश्य से दुर्ग सेंट्रल जेल में एलईडी बल्ब निर्माण का प्रशिक्षण शुरू किया गया है।
हर बैच में 10 बंदियों को यह तकनीकी कार्य सिखाया जाता है। जैसे ही एक बैच प्रशिक्षण पूर्ण करता है, अगला बैच तैयार हो जाता है। शुरूआत में जिन्हें इस कार्य का कोई ज्ञान नहीं था, वे अब कुशल कारीगर बन चुके हैं और प्रतिदिन सैकड़ों बल्ब तैयार कर रहे हैं। इन बल्बों को बाजार में भी बेचा जा रहा है, जिससे जेल को आय और बंदियों को आत्मविश्वास दोनों मिल रहे हैं।
जेल अधीक्षक मनीष संभाकर का मानना है कि यह पहल बंदियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएगी। सजा पूरी करने के बाद वे आत्मनिर्भर बनकर समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। कुछ बंदियों ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें इस प्रशिक्षण से न केवल नया हुनर मिला है, बल्कि भविष्य को लेकर एक नई सोच भी विकसित हुई है।
एक बंदी ने कहा, “हम आभारी हैं कि हमें जेल में रहते हुए यह अवसर मिला। अब मैं बाहर जाकर अपना एलईडी बल्ब निर्माण का कार्य शुरू कर सकूंगा और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकूंगा।”
यह पहल जेल को एक सुधार गृह के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब हर बल्ब की रौशनी में बंदियों के उज्जवल भविष्य की झलक नजर आती है। दुर्ग जेल की यह पहल न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है। यह दर्शाता है कि अगर किसी को सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो वह अपना जीवन बदल सकता है।
दुर्ग जेल की यह प्रेरक कहानी समाज को यह संदेश देती है कि सुधार की राह कभी बंद नहीं होती, बस जरूरत होती है एक सकारात्मक सोच और सहयोग की।





