Jantar Mantar gen z Student : छात्र राजनीति की वापसी सुखद पर भाषा की मर्यादा में गिरावट बड़ा सवाल
Vijay Nandan डिजिटल एडिटर
Jantar Mantar gen z Student : नई दिल्ली, कहा जाता है कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत धड़कन विश्वविद्यालयों और युवाओं के बीच सुनाई देती है। अगर छात्र सवाल पूछना छोड़ दें तो लोकतंत्र धीरे-धीरे दर्शक दीर्घा में बैठ जाता है। ऐसे में जंतर-मंतर पर हाल में देखने को मिला युवा आंदोलन इस बात का संकेत है कि देश की नई पीढ़ी अब भी अपने अधिकारों को लेकर सड़क पर उतरना जानती है। यह सकारात्मक संकेत है कि युवाओं का राजनीति और व्यवस्था से पूरी तरह मोहभंग नहीं हुआ है।
लेकिन इस आंदोलन ने एक दूसरा चेहरा भी दिखाया। मांगों से ज्यादा चर्चा उन वीडियो और रील्स की हो रही है, जिनमें कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा अभद्र भाषा, व्यक्तिगत टिप्पणियां और मर्यादा की सीमाएं पार करते हुए नारे लगाए गए। सवाल यही है कि विरोध का अधिकार और भाषा की गरिमा—क्या दोनों साथ नहीं चल सकते?

Jantar Mantar gen z Student : क्रांति के नाम पर शब्दों का दिवालियापन?
आज की डिजिटल पीढ़ी के पास मोबाइल की बैटरी भले कम हो जाए, लेकिन कैमरा हमेशा ऑन रहता है। हर नारा रिकॉर्ड हो रहा है, हर बयान वायरल हो रहा है और हर चेहरा कुछ ही मिनटों में देशभर की स्क्रीन पर पहुंच गया। विडंबना यह है कि कुछ युवाओं ने अपनी बात रखने के बजाय ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिन्हें शायद वे अपने घर के ड्राइंग रूम में बोलने का साहस भी न करें। विरोध की धार तब कमजोर पड़ जाती है जब तर्क की जगह गाली और विचार की जगह अपमान ले लेता है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असभ्यता कभी स्वीकार्य नहीं रही।
ये CJP की Gen Z मादाएं हैं, इसके नारे सुनिए
— Abhay Pratap Singh (बहुत सरल हूं) (@IAbhay_Pratap) July 26, 2026
– देश का युवा रोता है, मोदी का L छोटा है
ये अपने मां-बाप को मुंह कैसे दिखा पाते होंगे ? इन्हें देश के PM का प्राइवेट पार्ट छोटा लगता है
विडंबना ये है कि ऐसे जाहिलों को क्रिएटिव व क्रांतिकारी युवा बताया जा रहा है
इस भाषा के बाद कोई… pic.twitter.com/gY91Bq0lig
Jantar Mantar gen z Student : संस्कार ऑफलाइन हो गए हैं क्या?
यह सवाल किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं है। चिंता इस बात की है कि क्या हमारी डिजिटल पीढ़ी धीरे-धीरे भाषा की मर्यादा से दूर होती जा रही है?
भारत की पहचान दुनिया में केवल आईटी प्रोफेशनल्स या डॉक्टरों से नहीं बनी, बल्कि “नमस्ते”, शालीन व्यवहार और सम्मानजनक संवाद से भी बनी है। विदेशों में बसे भारतीय अक्सर अपने व्यवहार और संस्कारों के कारण सम्मान पाते हैं।
फिर हमारे ही देश में कुछ युवा सार्वजनिक मंचों पर ऐसी भाषा क्यों बोल रहे हैं जिसे उनके अपने माता-पिता भी सुनना पसंद न करें? क्या सोशल मीडिया की लाइक्स अब संस्कारों पर भारी पड़ने लगी हैं?

Jantar Mantar gen z Student : काउंसलिंग की जरूरत या कानूनी कार्रवाई?
यदि कोई युवा कानून तोड़ता है तो कानून अपना काम करेगा। लेकिन हर सामाजिक समस्या का समाधान केवल एफआईआर नहीं होती। यदि कम उम्र के छात्र सार्वजनिक रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं तो क्या उनकी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक काउंसलिंग होनी चाहिए? क्या परिवारों को भी यह बताया जाना चाहिए कि उनके बच्चे सार्वजनिक मंचों पर कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं?

यह सवाल दंड देने का कम और दिशा देने का अधिक है। आखिर 15 से 22 वर्ष की उम्र वह पड़ाव है जहां व्यक्तित्व अभी बन रहा होता है।
Jantar Mantar gen z Student : क्या पर्दे के पीछे कोई और निर्देशक है?
जब भी बड़े छात्र आंदोलन होते हैं, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह पूरी तरह स्वतः स्फूर्त हैं या इनके पीछे किसी राजनीतिक दल, छात्र संगठन या वैचारिक समूह की भूमिका भी है। यदि कोई संगठन युवाओं को अपनी बात रखने के बजाय उग्र और अपमानजनक भाषा अपनाने के लिए प्रेरित करता है, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए गंभीर चिंता का विषय है। किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी ताकत उसके तर्क होते हैं, उसके ट्रेंडिंग हैशटैग नहीं।
Jantar Mantar gen z Student : आंदोलन की ताकत मांगों से होती है, गालियों से नहीं
भारत ने जेपी आंदोलन देखा, अन्ना आंदोलन देखा और अनेक छात्र आंदोलनों का इतिहास देखा है। इन आंदोलनों ने सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर किया, लेकिन उनकी पहचान केवल नारों से नहीं बल्कि नैतिक बल से बनी। आज भी युवा यदि व्यवस्था से सवाल पूछते हैं तो उनका स्वागत होना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी है। लेकिन यदि सवालों की जगह अपशब्द ले लें, तो आंदोलन का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।
आज कुछ लोग क्रांति से पहले कैमरे का एंगल देखते हैं और नारे से पहले ट्रेंडिंग ऑडियो। कहीं ऐसा न हो कि इतिहास आंदोलन को नहीं, केवल वायरल क्लिप को याद रखे। आखिर लोकतंत्र में आवाज़ ऊंची होना जरूरी है, लेकिन भाषा ऊंची होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।



