लाल किले से फिर गूंजेगी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की स्वदेशी तोप

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लाल किले से फिर गूंजेगी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की स्वदेशी तोप

15 अगस्त 2025 को 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में भारत इन गनों से 21 तोपों की सलामी देगा – एक गूंज, जो न केवल आज़ादी का जश्न है बल्कि देश की रक्षा ताकत और मेक इन इंडिया की सफलता की भी आवाज़ है।

यह वही गन है जिसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को उसकी सीमा पर जवाब देते हुए मजबूर कर दिया था।


क्यों खास है 105 mm स्वदेशी गन?

दो वेरिएंट में उपलब्ध:

  • इंडियन फील्ड गन (IFG)
  • लाइट फील्ड गन (LFG) – हल्की और मोबाइल

तकनीकी विशेषताएं:

  • कैलिबर: 105 mm
  • फायरिंग रेट: प्रति मिनट 6 राउंड
  • मारक दूरी: 16 से 20 किलोमीटर
  • तैनाती क्षमता: हेलिकॉप्टर द्वारा पहाड़ों या दुर्गम क्षेत्रों में आसानी से

निर्माण:

  • निर्माता: ऑर्डिनेन्स फैक्ट्री बोर्ड (OFB)
  • लोकेशन: जबलपुर स्थित गन कैरिज फैक्ट्री (GCF)

‘ऑपरेशन सिंदूर’ और गन का जुड़ाव

ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की एक साहसिक सैन्य कार्रवाई थी जिसमें स्वदेशी हथियारों ने अहम भूमिका निभाई। इस ऑपरेशन में 105 mm गन ने ऐसा कहर बरपाया कि पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद इस गन की ताकत और मांग दोनों तेजी से बढ़ीं।


अब लाल किले से होगी ‘स्वदेशी गरज’

पहले ब्रिटिश 25 पाउंडर गन से सलामी दी जाती थी, लेकिन बीते तीन सालों से अब हर स्वतंत्रता दिवस पर यही स्वदेशी गन सलामी दे रही है। इस साल भी 21 तोपों की सलामी राष्ट्रगान की 52 सेकंड की अवधि के दौरान दी जाएगी।

यह न केवल सैन्य ताकत का प्रदर्शन है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और तकनीकी आत्मबल का उत्सव भी।


बढ़ती मांग, बढ़ता उत्पादन

ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस गन की मांग में बड़ी तेजी आई।
इस मांग को पूरा करने के लिए जबलपुर की GCF फैक्ट्री में अब 18 नई लाइट फील्ड गन तैयार की जा रही हैं। कुल संख्या को बढ़ाकर 36 गन तक ले जाने की योजना है।


क्या आप जानते हैं?

  • लाइट फील्ड गन को हेलिकॉप्टर से सीधे ऊँचे पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जा सकता है।
  • इसे वर्ष 1982 में भारतीय सेना में शामिल किया गया था।
  • यह गन दुश्मन के बंकरों, छावनियों और मूविंग टारगेट को सटीकता से निशाना बना सकती है।

भारत की रक्षा, भारत के हथियार से

स्वतंत्रता दिवस पर 105 mm लाइट फील्ड गन की गूंज अब सिर्फ सलामी नहीं, बल्कि एक संदेश है — भारत अब दूसरों पर निर्भर नहीं, बल्कि खुद का रक्षक बन चुका है।

इस ऐतिहासिक गन की धमक हमें याद दिलाती है कि ‘मेड इन इंडिया’ अब सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जमीन पर उतरी रणनीति है जो हमारी सीमाओं से लेकर राष्ट्रीय पर्व तक गर्व से गरज रही है।

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