हाइलाइट्स:
✔️ आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम मंदिर में मिला 1456 CE का ताम्रपत्र
✔️ हेलीस कॉमेट के ऐतिहासिक दर्शन का सबसे पुराना भारतीय उल्लेख
✔️ श्रीशैलम मंदिर: जहां एक साथ स्थित हैं ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ
✔️ कॉमेट्स, उल्कापिंड और उल्का वर्षा का वैज्ञानिक व पौराणिक महत्व
हेलीस कॉमेट का सबसे पुराना भारतीय रिकॉर्ड मिला
भारत के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले आंध्र प्रदेश स्थित श्रीशैलम मल्लिकार्जुन मंदिर से एक अनोखी ऐतिहासिक खोज सामने आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की एपिग्राफी शाखा के निदेशक डॉ. के मणिरत्न रेड्डी ने जानकारी दी कि यहां विजयनगर साम्राज्य के काल (1456 ईस्वी) का एक ताम्रपत्र (कॉपर प्लेट इनस्क्रिप्शन) मिला है, जिसमें हेलीस कॉमेट और उससे जुड़े उल्कापिंडों (Meteor Showers) का स्पष्ट उल्लेख है।
क्या है एपिग्राफी और इनस्क्रिप्शन?
- इनस्क्रिप्शन: किसी पत्थर, ताम्रपत्र या दीवार पर उकेरे गए प्राचीन लेख।
- एपिग्राफी: इन प्राचीन लेखों को पढ़ने, समझने और उनके अर्थ का अध्ययन करने की विद्या।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत में हेलीस कॉमेट के प्राचीनतम उल्लेखों में से एक है।
हेलीस कॉमेट: अंतरिक्ष का चमकता मेहमान
हेलीस कॉमेट (Halley’s Comet) एक ऐसा खगोलीय पिंड है जो हर 75-76 वर्षों में धरती के पास से गुजरता है। इसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है। इसका नाम मशहूर खगोलशास्त्री एडमंड हेली के नाम पर पड़ा। कॉमेट्स को उनकी सूरज की परिक्रमा अवधि के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
- शॉर्ट पीरियड कॉमेट्स: जो 200 साल से कम समय में सूरज की परिक्रमा पूरी करते हैं। जैसे हेलीस कॉमेट।
- लॉन्ग पीरियड कॉमेट्स: जिनकी परिक्रमा में 200 साल से अधिक का समय लगता है।
आखिरी बार हेलीस कॉमेट 1986 में दिखाई दिया था और अगली बार इसके दर्शन वर्ष 2061 में संभव हैं।
प्राचीन भारत में कॉमेट्स को क्यों माना जाता था अशुभ?
पुराने समय में कॉमेट्स और उल्कापिंडों को अशुभ संकेत माना जाता था। मान्यता थी कि इनकी उपस्थिति से:
- प्राकृतिक आपदाएं आती हैं
- राजाओं और राज्यों पर संकट आता है
- युद्ध, बीमारी या अकाल जैसे हालात उत्पन्न होते हैं
इसी विश्वास के चलते विजयनगर के राजा मल्लिकार्जुन ने 1456 में एक वैदिक विद्वान लिंगानार्या को गाँव दान में दिया ताकि कॉमेट और उल्कापात से होने वाले संकट को टाला जा सके।
उल्कापात (Meteor Showers) और उल्का (Meteor) क्या हैं?
- कॉमेट (धूमकेतु): बर्फ, धूल और गैस से बना पिंड, जो सूरज के करीब आने पर जलने लगता है और लंबी पूंछ बनाता है।
- मिटिओर (उल्का): अंतरिक्ष से धरती की ओर आने वाला पत्थर या धातु का टुकड़ा, जो वायुमंडल में प्रवेश कर जल उठता है।
- मिटिओर शावर (उल्कावृष्टि): जब बड़ी संख्या में उल्काएं एक साथ गिरती हैं, जिससे आसमान में तारे टूटते हुए नजर आते हैं।
श्रीशैलम मंदिर: ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ का अद्भुत संगम
आंध्र प्रदेश के घने जंगलों में स्थित श्रीशैलम मंदिर को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह मंदिर दो धार्मिक आस्थाओं का संगम है:
- मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: भगवान शिव का प्रमुख शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा स्थान।
- श्री ब्रह्मरांबा शक्तिपीठ: देवी शक्ति को समर्पित शक्तिपीठ, 18 महाशक्ति पीठों में छठा स्थान।
पौराणिक मान्यता
कहते हैं, यहां सती देवी का कंठ (गला) गिरा था, जिससे यह स्थान शक्तिपीठ बना। साथ ही, यह भगवान शिव और देवी शक्ति दोनों की पूजा का केंद्र है।
श्रीशैलम मंदिर की अन्य खास बातें
✔️ मंदिर परिसर में स्थित है स्वयंभू ज्योतिर्लिंग, जो किसी इंसान द्वारा नहीं बनाया गया।
✔️ यहां जलती है अखंड ज्योति, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित माना जाता है।
✔️ मंदिर के पास स्थित है पाताल गंगा, कृष्णा नदी का पवित्र बैकवाटर, जहां स्नान करने से पाप मिटते हैं।
✔️ यहां का शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है – सुबह सफेद, दोपहर में लाल, शाम को काला।
✔️ महाशिवरात्रि के मौके पर हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
श्रीशैलम: भक्ति, रहस्य और इतिहास का संगम
श्रीशैलम सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि भक्ति, इतिहास और खगोलीय घटनाओं का संगम है। यहां पर हेलीस कॉमेट से जुड़े सबसे पुराने भारतीय प्रमाण का मिलना न सिर्फ इतिहासकारों के लिए, बल्कि आम लोगों के लिए भी बड़ी खबर है। यह खोज दिखाती है कि कैसे हमारे पूर्वज खगोल विज्ञान को समझते थे और उसे अपने धार्मिक और सामाजिक जीवन में शामिल करते थे।
निष्कर्ष
श्रीशैलम मंदिर की यह ऐतिहासिक खोज न सिर्फ भारतीय इतिहास में एक अहम कड़ी जोड़ती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि भारत में खगोलीय घटनाओं का अध्ययन और उनका प्रभाव हजारों सालों से जीवन का हिस्सा रहा है। यदि आप धर्म, इतिहास और खगोल विज्ञान में रुचि रखते हैं, तो श्रीशैलम मंदिर आपके लिए अवश्य घूमने लायक स्थल है।
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