अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर सख्त इमिग्रेशन नीति की ओर कदम बढ़ाते हुए 12 देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए यह निर्णय लिया, लेकिन इसमें पाकिस्तान को शामिल नहीं करना विशेषज्ञों के बीच बहस का कारण बन गया है।
किन देशों पर लगा प्रतिबंध?
ट्रंप प्रशासन ने जिन देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर रोक लगाई है, वे हैं:
- अफगानिस्तान
- ईरान
- म्यांमार
- चाड
- कांगो गणराज्य
- इक्वेटोरियल गिनी
- एरीट्रिया
- हैती
- लीबिया
- सोमालिया
- सूडान
- यमन
इन देशों से आने वाले लोगों के लिए अमेरिका में प्रवेश या वीज़ा प्रक्रिया आंशिक या पूर्ण रूप से प्रतिबंधित की गई है।
प्रतिबंध का कारण क्या बताया गया?
यह निर्णय कोलोराडो में यहूदी प्रदर्शन पर हुए फ्लेमथ्रोवर हमले के बाद लिया गया। उस घटना के बाद जांच में सामने आया कि हमलावर अमेरिका में अवैध रूप से रह रहा था। ट्रंप ने कहा कि जिन देशों से ठोस सुरक्षा जांच और विश्वसनीय वेरिफिकेशन संभव नहीं है, उनके नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
आंशिक प्रतिबंध वाले देश
इसके अलावा बुरुंडी, क्यूबा, लाओस, सिएरा लियोन, टोगो, तुर्कमेनिस्तान और वेनेजुएला जैसे सात देशों पर आंशिक यात्रा प्रतिबंध लागू किया गया है।
पाकिस्तान को क्यों छोड़ा गया?
विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुनिया भर में आतंकियों को पनाह देने वाले देश पाकिस्तान को इस सूची से क्यों बाहर रखा गया?
ट्रंप ने एक तरफ तो कई मुस्लिम देशों को बैन किया है, वहीं पाकिस्तान को नजरअंदाज करना उनकी नीति में विरोधाभास दिखाता है।
एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
प्रख्यात रक्षा विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:
“ट्रंप के प्रतिबंध में म्यांमार जैसे देश शामिल हैं, जहां अमेरिका खुद विद्रोहियों की मदद करता है, लेकिन पाकिस्तान जैसे आतंकवाद केंद्र को छोड़ दिया गया है। यह उनके भारत के पड़ोसियों के प्रति छिपे दृष्टिकोण को दर्शाता है।”
क्या यह सुरक्षा या रणनीतिक राजनीति है?
ट्रंप की यह नीति स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से अधिक भू-राजनीतिक रणनीति दिखा रही है। जहां कुछ देश कड़े प्रतिबंधों की चपेट में हैं, वहीं पाकिस्तान जैसे देश को छोड़ना यह साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फैसले आंतरिक सुरक्षा से ज्यादा राजनयिक समीकरणों पर आधारित होते हैं।





