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वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश किया पक्ष, जानिए क्या कहा गया

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BY: Yoganand Shrivastva

नई दिल्ली: वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आधिकारिक जवाब दाखिल किया है। सरकार ने अपने जवाब में कानून के पीछे की प्रक्रिया और कारणों को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह संशोधन सोच-समझकर, विस्तृत विचार-विमर्श के बाद किया गया है।

सरकार ने बताया कि इस विधेयक को संसद में पारित करने से पहले संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की 36 बैठकों का आयोजन हुआ था, जिसमें देश भर से 97 लाख से अधिक लोगों के सुझाव प्राप्त किए गए थे। समिति ने देश के 10 प्रमुख शहरों का दौरा कर आम जनता की राय भी जानी।

वक्फ संपत्तियों के संबंध में सरकार की दलील

केंद्र का कहना है कि वक्फ संपत्ति को मान्यता देने के लिए मौखिक दावों के बजाय पंजीकरण को अनिवार्य करना जरूरी था, क्योंकि बीते 100 वर्षों से प्रचलित प्रावधान यही रहे हैं। सरकार के मुताबिक, कुछ मामलों में सरकारी भूमि को जानबूझकर या गलती से वक्फ संपत्ति के तौर पर दिखाया जा रहा था, जिससे राजस्व अभिलेखों में सुधार की आवश्यकता महसूस की गई।

वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिमों की भागीदारी पर स्पष्टीकरण

सरकार ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि संशोधन के बाद वक्फ परिषद और बोर्ड में अधिकतम दो गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल हो सकते हैं। यह कदम समावेशिता बढ़ाने की दिशा में उठाया गया है और इससे वक्फ प्रशासन में किसी तरह का धार्मिक हस्तक्षेप नहीं होता।

मुतवल्ली की भूमिका और न्यायिक समीक्षा पर टिप्पणी

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मुतवल्ली की जिम्मेदारी धर्मनिरपेक्ष होती है, न कि धार्मिक। इसके अलावा, सरकार ने यह भी दलील दी कि किसी भी कानून के आंशिक प्रावधानों पर रोक नहीं लगाई जा सकती, बल्कि यदि न्यायिक समीक्षा होनी है तो पूरे कानून को ही निष्प्रभावी घोषित करना होता है। साथ ही यह भी कहा गया कि संसद द्वारा पारित कानून को संवैधानिक प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व की भावना के तहत ही स्वीकार किया जाना चाहिए।

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