UAE: संयुक्त अरब अमीरात ने मंगलवार को एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि वह 1 मई से OPEC और OPEC+ समूह से बाहर निकल जाएगा। यह फैसला लंबे समय से चल रही असहमति और उत्पादन सीमाओं को लेकर बढ़ते तनाव के बीच लिया गया है। UAE कई दशकों से इस संगठन का अहम सदस्य रहा है।
OPEC से UAE का ऐतिहासिक जुड़ाव
UAE का OPEC से जुड़ाव काफी पुराना है। सबसे पहले 1967 में अबू धाबी के जरिए यह संगठन से जुड़ा था और 1971 में देश के गठन के बाद पूर्ण सदस्य बना। तब से लेकर अब तक UAE वैश्विक तेल बाजार में OPEC के माध्यम से अहम भूमिका निभाता रहा है।
सऊदी अरब से प्रतिस्पर्धा बनी दूरी की वजह

सऊदी अरब के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी इस फैसले की बड़ी वजह मानी जा रही है। खासतौर पर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब ने आक्रामक आर्थिक नीतियां अपनाईं, जिससे दोनों देशों के बीच निवेश और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर टकराव बढ़ा। UAE ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत कई मुद्दों पर अलग रुख अपनाया है।
UAE: उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर जोर
UAE ने अपनी सरकारी एजेंसी WAM के माध्यम से कहा कि वह ऊर्जा उत्पादन क्षमता में तेजी से निवेश कर रहा है। OPEC से बाहर होने के बाद भी देश संतुलित तरीके से अतिरिक्त तेल उत्पादन जारी रखेगा। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार की मांग के अनुसार आपूर्ति बनाए रखना और खुद को एक भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करना है।
OPEC के प्रभाव में आई कमी
हाल के वर्षों में अमेरिका द्वारा तेल उत्पादन बढ़ाने से OPEC का प्रभाव कुछ कम हुआ है। हालांकि सऊदी अरब अब भी संगठन का सबसे प्रभावशाली सदस्य बना हुआ है। बदलते वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में UAE का यह फैसला OPEC की भूमिका पर भी असर डाल सकता है।
मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ेगा असर
UAE और सऊदी अरब के बीच पहले यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक साथ सैन्य अभियान चलाया गया था, लेकिन बाद में दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा। अब UAE के OPEC से बाहर होने के फैसले को मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जिसका असर वैश्विक तेल बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
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