BY: Yoganand Shrivastva
सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के गंभीर अपराध और व्यक्तिगत रिश्तों के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा है कि हर असफल या खराब रिश्ते को बलात्कार का मामला बताना कानून का दुरुपयोग है और इससे अपराध की गंभीरता कम हो जाती है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
पीठ, जिसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन शामिल थे, ने सोमवार (25 नवंबर 2025) सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। महाराष्ट्र के एक वकील पर लगाई गई रेप और आपराधिक धमकी की एफआईआर और आरोपपत्र को कोर्ट ने खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा:
“बलात्कार का अपराध केवल उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहां वास्तविक यौन हिंसा, ज़बरदस्ती या स्वतंत्र सहमति की कमी हो। हर खराब रिश्ते को बलात्कार में बदलना न केवल अपराध की गंभीरता कम करता है, बल्कि आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक भी थोपता है।”
मामले का सार
- शिकायत दर्ज कराने वाली महिला ने शुरुआत में गुजारा भत्ता के मामले में कानूनी मदद के लिए वकील से संपर्क किया था।
- बाद में उन्होंने कथित तौर पर लंबे समय तक वकील के साथ घनिष्ठ और भावनात्मक रिश्ता रखा।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत यह दर्शाते हैं कि यह सहमति से बना रिश्ता था, जो बाद में विवाद में बदल गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय समाज में महिलाएं अक्सर शादी या संबंधों के वादों पर सहमति देती हैं, और अगर वादा बुरी नीयत से केवल शोषण के लिए किया गया हो, तो ऐसी सहमति अमान्य हो सकती है।
सावधानी का संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे आरोपों का समर्थन विश्वसनीय सबूत और ठोस तथ्यों पर होना चाहिए, न कि निराधार आरोपों या नैतिक अनुमान पर। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि कानून और कलंक में अंतर समझना जरूरी है, और केवल व्यक्तिगत रिश्तों में विवाद को गंभीर अपराध के रूप में पेश करना न्याय का हनन है।





