BY: Yoganand Shrivastva
Ravan Worship in Punjab देशभर में जहां विजय दशमी के दिन रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहीं पंजाब के लुधियाना जिले स्थित पायल कस्बे में परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां रावण को जलाने के बजाय उसकी विशेष पूजा और राजतिलक किया जाता है। स्थानीय दुबे परिवार पिछले नौ पीढ़ियों से यानी करीब 185 सालों से इस अनोखी परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभाता आ रहा है।
1835 से चली आ रही है यह अनूठी परंपरा
Ravan Worship in Punjab पायल के ऐतिहासिक राम मंदिर में भगवान राम के साथ-साथ रावण की भी पक्की मूर्ति स्थापित है। इस परंपरा की शुरुआत के पीछे एक दिलचस्प मान्यता जुड़ी है। कहा जाता है कि दुबे परिवार के पूर्वज बीरबल दास संतानहीनता के दुख में घर छोड़कर हरिद्वार जा रहे थे, तभी रास्ते में एक साधु ने उन्हें वापस आकर रामलीला और दशहरा मनाने की सलाह दी। इसके बाद उनके घर चार संतानों का जन्म हुआ, तभी से इस परिवार और स्थानीय लोगों के लिए रावण श्रद्धा और सम्मान का केंद्र बन गया। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह मंदिर वर्ष 1835 में बना था।
शराब का भोग और खून से राजतिलक की रस्म
Ravan Worship in Punjab यहाँ दशहरे के दिन पूजा-पद्धति बेहद अनूठी होती है। सूरज ढलने तक चलने वाली इस विशेष आराधना में रावण की मूर्ति पर शराब चढ़ाई जाती है। इसके बाद, बकरे के कान पर हल्का सा कट लगाकर उससे निकलने वाले खून से रावण का राजतिलक किया जाता है। अंत में मूर्ति के सिर पर हल्की आग जलाई जाती है, जिसे स्थानीय लोग अत्यंत शुभ मानते हैं। लोगों का मानना है कि रावण केवल बुराइयों का प्रतीक नहीं, बल्कि वेदों के महाज्ञानी, प्रकांड पंडित और भगवान शिव के परम भक्त थे।
नई पीढ़ी और स्थानीय लोगों की गहरी आस्था
Ravan Worship in Punjab इस अनोखे रीति-रिवाज से केवल दुबे परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा पायल शहर जुड़ा हुआ है। यहां के निवासियों का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे मन से जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है। रामलीला में बरसों से रावण का किरदार निभा रहे कलाकारों और स्थानीय लोगों का यह प्रयास आने वाली पीढ़ी को अपनी इस अनूठी विरासत और इतिहास से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।


