BY: Vijay Yadav
भारत में दशहरा या विजयादशमी का पर्व हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार शारदीय नवरात्रि के समापन के अगले दिन मनाया जाता है और इसे अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक माना जाता है।
दशहरे पर पूरे देश में रावण दहन होता है और भगवान श्रीराम की विजयगाथा का स्मरण किया जाता है। आइए जानते हैं इस पर्व का धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं।

भगवान श्रीराम और रावण की कथा
दशहरा मनाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध कहानी भगवान श्रीराम से जुड़ी है।
इसी विजय के कारण इस दिन को विजयादशमी कहा जाता है। साथ ही रावण के साथ उसके भाई कुंभकरण और पुत्र मेघनाद के पुतले भी जलाए जाते हैं।
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा
दशहरा का एक और महत्वपूर्ण पहलू मां दुर्गा और महिषासुर की कथा से जुड़ा है।
तभी से दशमी के दिन को विजयादशमी के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है। इसी दिन दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन भी होता है।
दशहरे का संदेश: अच्छाई की जीत
दशहरा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि एक गहरा संदेश भी देता है
चाहे वह भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध हो या मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार, दोनों ही कथाएं हमें यही सिखाती हैं कि सत्य और धर्म की हमेशा जीत होती है।
दशहरा 2026 न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी खास है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी चुनौतियां क्यों न हों, सही राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजयी होता है।
दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। हर वर्ष रावण दहन की परंपरा हमें याद दिलाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय सत्य, धर्म और सदाचार की ही होती है।
आज के दौर में दशहरे की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। समाज भ्रष्टाचार, हिंसा, अहंकार, भेदभाव और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में रावण के दस सिर केवल पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि उन बुराइयों के प्रतीक भी माने जा सकते हैं, जिनसे हर व्यक्ति और समाज को मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए।
दशहरा सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करने का अवसर भी है। मेले, रामलीलाएं और सामूहिक आयोजन विभिन्न वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, इतिहास और आदर्शों से जुड़ने का अवसर मिलता है।
हालांकि, दशहरे का वास्तविक लाभ तभी है, जब रावण का पुतला जलाने के साथ हम अपने भीतर के अहंकार, लालच और द्वेष को भी समाप्त करने का संकल्प लें। परंपराएं तभी सार्थक होती हैं, जब वे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं। दशहरा हमें यही संदेश देता है कि समाज की वास्तविक विजय बुराई के प्रतीक को जलाने में नहीं, बल्कि बुराइयों को जीवन से मिटाने में है।

