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Industrial Revolution: रोज स्कूल से लेकर 9 से 5 की नौकरी तक, आखिर किसने बनाया यह सिस्टम?

Industrial Revolution

BY: Yoganand Shrivastva

Industrial Revolution सुबह स्कूल जाना, तय समय पर कक्षाओं में बैठना, परीक्षा देना, डिग्री हासिल करना और फिर नौकरी में लग जाना आज जीवन का सामान्य हिस्सा माना जाता है। लेकिन यह व्यवस्था हमेशा से ऐसी नहीं थी। इतिहास में देखें तो शिक्षा और काम करने का तरीका समय के साथ समाज, अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास की जरूरतों के अनुसार बदलता गया। प्राचीन गुरुकुल और पारंपरिक हुनर सीखने की व्यवस्था से शुरू हुआ सफर आगे चलकर संगठित स्कूल, परीक्षाओं, डिग्री और तय काम के घंटों तक पहुंचा।

प्राचीन समाज में परिवार और गुरु से मिलती थी शिक्षा

Industrial Revolution पुराने समय में आज की तरह हर बच्चे के लिए स्कूल जाना अनिवार्य व्यवस्था नहीं थी। बच्चे परिवार, समुदाय, धार्मिक केंद्रों या किसी हुनरमंद गुरु के साथ रहकर ज्ञान और काम सीखते थे। खेती, पशुपालन, व्यापार, दस्तकारी और दूसरे व्यावहारिक कौशल जीवन की शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

Industrial Revolution पढ़ने-लिखने की सुविधा देने वाले कुछ केंद्र जरूर मौजूद थे, लेकिन वहां पहुंच सीमित लोगों तक ही थी। आम लोगों के लिए जीवन के अनुभव और परिवार के बड़े-बुजुर्गों से सीखा गया हुनर ही शिक्षा का प्रमुख माध्यम था।

चीन से शुरू हुई प्रतियोगी परीक्षा की परंपरा

Industrial Revolution आज सरकारी नौकरी या किसी बड़े पद के लिए प्रतियोगी परीक्षा देना सामान्य बात है, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन चीन की शाही परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी मानी जाती हैं। सुई राजवंश के दौरान योग्य लोगों को प्रशासन में शामिल करने के लिए परीक्षा प्रणाली विकसित की गई। बाद में तांग और सोंग राजवंशों के समय इसे और व्यवस्थित किया गया।

इस व्यवस्था का उद्देश्य वंश के आधार पर पद देने के बजाय योग्यता के आधार पर अधिकारियों का चयन करना था। हालांकि सामाजिक असमानताओं के कारण इसका लाभ सभी लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका। यह परीक्षा व्यवस्था लंबे समय तक चली और 1905 में इसे आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया।

औद्योगिक क्रांति ने स्कूल और 8 घंटे की नौकरी का ढांचा बदला

Industrial Revolution 18वीं और 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति ने शिक्षा और काम दोनों की व्यवस्था को बड़े स्तर पर बदल दिया। फैक्ट्रियों में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारियों की जरूरत बढ़ी, जो पढ़ना-लिखना, गणना करना और तय निर्देशों के अनुसार काम करना जानते हों। इसी दौर में बच्चों को सामूहिक रूप से पढ़ाने वाली संगठित शिक्षा व्यवस्था का विस्तार हुआ। नियमित कक्षाएं, समय-सारणी, घंटी और परीक्षाएं इसी बदलती जरूरत का हिस्सा बनीं।

फैक्ट्री व्यवस्था में काम करने वाले मजदूरों को शुरुआती दौर में 12 से 16 घंटे तक काम करना पड़ता था। इसके खिलाफ लंबे समय तक श्रमिक आंदोलन हुए और काम के घंटे सीमित करने की मांग उठी। वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने प्रतिदिन 8 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे काम करने के सिद्धांत को मान्यता दी।

समय के साथ स्कूल, कॉलेज और डिग्री रोजगार से जुड़ते चले गए। स्कूल से बुनियादी शिक्षा, कॉलेज से विशेषज्ञता और डिग्री के जरिए नौकरी हासिल करने का रास्ता एक स्थापित व्यवस्था बन गया। हालांकि तकनीक और इंटरनेट के दौर में यह मॉडल फिर बदल रहा है। कंपनियां अब केवल डिग्री के बजाय कौशल, अनुभव और लगातार नई चीजें सीखने की क्षमता को भी महत्व दे रही हैं।

वर्क फ्रॉम होम, पार्ट-टाइम काम और लचीले कामकाजी घंटे जैसी व्यवस्थाएं पारंपरिक 9 से 5 की नौकरी के मॉडल को चुनौती दे रही हैं। यानी जिस शिक्षा और रोजगार व्यवस्था को आज सामान्य माना जाता है, वह भी समय के साथ लगातार बदल रही है।

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