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यूरोप टूर में धोखाधड़ी, 10 साल बाद उपभोक्ता फोरम का फैसला : ट्रैवल एजेंसी को लौटाने होंगे ₹7.29 लाख

BY: Yoganand Shrivastva

इंदौर | यूरोप की सैर कराने का वादा करने वाली ट्रैवल एजेंसी ने यात्री से भारी रकम वसूली, लेकिन वादे के मुताबिक पैकेज पूरा नहीं कराया। मामला उपभोक्ता फोरम तक पहुँचा और करीब 10 साल चली सुनवाई के बाद अब फोरम ने पीड़ित यात्री के पक्ष में फैसला सुनाया है। आदेश में कंपनी को 7.29 लाख रुपए ब्याज सहित लौटाने और मानसिक प्रताड़ना के लिए 10 हजार रुपए अतिरिक्त देने का निर्देश दिया गया है।

मामला क्या है?

रेस कोर्स रोड निवासी जगदीश गोदानी ने वर्ष 2013 में थॉमस कुक इंडिया लि. की मुंबई और इंदौर शाखा से यूरोप यात्रा का पैकेज बुक कराया था। यह टूर 17 अगस्त 2013 से 30 अगस्त 2013 तक चलना था, जिसमें इटली, आस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, बेल्जियम और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों की यात्रा शामिल थी।

यात्रा के लिए गोदानी परिवार ने आवश्यक दस्तावेज कंपनी को दिए। कंपनी ने उनकी पत्नी, बेटी और बेटे के वीजा बनवाए, लेकिन बेटे अंकुल के वीजा में नाम की त्रुटि कर दी, जिसे सुधारने का आश्वासन तीन-चार दिनों में दिया गया।

आधा टूर, आधा धोखा

पहले चरण में गोदानी ने 3.47 लाख रुपए जमा किए और शेष 6.76 लाख रुपए भी बाद में कंपनी को दे दिए। कुल राशि लगभग 10.25 लाख रुपए थी।
लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले बताया गया कि अंकुल का वीजा कन्फर्म नहीं हुआ है। इसके बावजूद परिवार मुंबई पहुँचा और दो दिन वहीं रुका। बाद में उन्हें यूरोपियन एक्स्ट्रा बेनेजा टूर की बजाय बेस्ट ऑफ यूरोप पैकेज पर ले जाया गया। यह पैकेज सस्ता था (लगभग 2.94 लाख रुपए), जबकि महँगे पैकेज के पैसे लिए गए थे।

कानूनी लड़ाई की शुरुआत

2015 में जब पैसे वापस नहीं मिले, तो जगदीश गोदानी ने एडवोकेट सुरेश कांगा के माध्यम से उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई। केस की सुनवाई लगभग 10 वर्षों तक चलती रही।

फोरम का फैसला

7 अगस्त 2025 को उपभोक्ता फोरम की दो सदस्यीय बेंच—जज विकास राय और सदस्य कुंदनसिंह चौहान—ने ट्रैवल एजेंसी की सेवा में गंभीर कमी मानते हुए आदेश दिया कि:

  • कंपनी को 7.29 लाख रुपए 11 सितंबर 2015 (शिकायत दर्ज होने की तारीख) से लेकर फैसले की तारीख तक 6% वार्षिक ब्याज सहित लौटाने होंगे।
  • साथ ही, मानसिक पीड़ा के लिए ₹10,000 हर्जाना भी अदा करना होगा।
  • पूरी राशि 45 दिनों में जमा करनी होगी।

यात्री के पक्ष में सबूत

फोरम में फरियादी द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज—जैसे टूर कोटेशन, भुगतान की रसीदें, गलत और सही वीजा की कॉपियाँ, ईमेल संवाद, फ्लाइट टिकट और वीजा सर्टिफिकेट—निर्णायक साबित हुए।
फोरम ने माना कि कंपनी चाहती तो समय रहते अन्य देशों से अंकुल का वीजा जारी करा सकती थी, लेकिन उसने कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।

लगातार 10 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार उपभोक्ता को न्याय मिला। यह फैसला न केवल धोखाधड़ी करने वाली कंपनियों के लिए चेतावनी है, बल्कि यात्रियों के लिए भी सबक है कि अपने अधिकारों की रक्षा हेतु वे उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

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