by: vijay yadav
CJP Lehra Do Tiranga March : नई दिल्ली, राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च को लेकर शुक्रवार को राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज रही। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में तिरंगा फहराने के आह्वान के साथ प्रदर्शन का ऐलान किया था। इसके मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और लोगों से प्रस्तावित जमावड़े से दूर रहने की अपील की।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मार्च से पहले पुलिस ने अभिजीत दीपके को निषेधाज्ञा की जानकारी दी थी। बाद में उन्हें हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई। प्रदर्शन को लेकर सेंट्रल पार्क और आसपास के इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई।

CJP Lehra Do Tiranga March : सेंट्रल पार्क में प्रवेश पर रोक, पुलिस की कड़ी निगरानी
CJP के प्रस्तावित मार्च को देखते हुए नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) ने कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्टूबर को बंद रखने का निर्णय लिया। दिल्ली पुलिस ने इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने की जानकारी दी।
#WATCH | People carry out the ‘Lehra Do Tiranga’ protest march in the national capital, following a call by the CJP for the demonstration today.
— ANI (@ANI) October 16, 2026
CJP Founder Abhijeet Dipke has been detained by Delhi Police pic.twitter.com/M0cBpeza2P
पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लोगों से निर्धारित प्रतिबंधों का पालन करने की अपील की। कनॉट प्लेस के इनर और आउटर सर्कल में यातायात और पैदल आवाजाही को लेकर अलग व्यवस्था की गई, जबकि सेंट्रल पार्क में प्रस्तावित जमावड़े को रोकने की तैयारी की गई।
CJP Lehra Do Tiranga March : अभिजीत दीपके ने उठाए सवाल
CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने मार्च के जरिए राष्ट्रीय ध्वज फहराने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का मुद्दा उठाया। पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने सवाल किया कि तिरंगा फहराने की घोषणा को गैरकानूनी क्यों माना जा रहा है।
यह मार्च केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने तक सीमित नहीं था। इसके जरिए पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपनी आपत्तियां भी उठाईं।
CJP Lehra Do Tiranga March : CJP नेताओं की गिरफ्तारी के बाद बढ़ा विवाद
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी का मामला है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों नेताओं को जंतर-मंतर पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच वहां प्रवेश करने और नारेबाजी करने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की खबर सामने आई।
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित किए जाने की स्थिति में बदलाव के बाद CJP और पुलिस के बीच विवाद बढ़ा। पार्टी ने अपने नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों को लेकर तिरंगा मार्च का आह्वान किया।
CJP Lehra Do Tiranga March : मार्च रोकने की याचिका पर हाईकोर्ट का तत्काल हस्तक्षेप नहीं
CJP के प्रस्तावित मार्च के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। इसमें प्रदर्शन के कारण कारोबारियों को संभावित नुकसान और उसकी भरपाई से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने मार्च पर तत्काल रोक लगाने की मांग पर हस्तक्षेप करने से इनकार किया। हालांकि, इसे पुलिस की ओर से प्रदर्शन की अनुमति मिलने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात कही। प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव के बीच राजधानी के प्रमुख व्यावसायिक इलाके कनॉट प्लेस में सुरक्षा और आवाजाही पर विशेष निगरानी रखी गई।
CJP Lehra Do Tiranga March : संपादकीय नजरिया
दिल्ली में CJP के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च को लेकर उठा विवाद कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। तिरंगा देश की एकता, संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। वहीं, लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति व्यक्त करना भी नागरिकों का अधिकार है। लेकिन किसी भी आंदोलन का उद्देश्य और तरीका कानून के दायरे में होना चाहिए। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे, लेकिन प्रतिबंधों और पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता भी सुनिश्चित करे।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों को भी यह समझना होगा कि सार्वजनिक स्थलों पर विरोध करते समय आम नागरिकों, कारोबारियों और यातायात पर पड़ने वाले प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग से जुड़े सवाल हों या गिरफ्तारी के विरोध का मामला, उनका समाधान तथ्यों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और संवाद से निकलना चाहिए। तिरंगे की गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन ही मजबूत लोकतंत्र की असली पहचान है।


