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Aboobacker Musliyar : केरल के 95 वर्षीय मुस्लिम धर्मगुरु के महिलाओं पर बयान से विवाद, सार्वजनिक कार्यक्रमों को लेकर कही ये बात

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Aboobacker Musliyar : कोच्चि। केरल में एक वरिष्ठ मुस्लिम धर्मगुरु के महिलाओं को लेकर दिए गए बयान पर विवाद खड़ा हो गया है। 95 वर्षीय कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार ने कोच्चि में आयोजित एक इस्लामिक सम्मेलन में महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी और पुरुषों के साथ मंच साझा करने को लेकर अपनी राय रखी। उनके बयान की राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर आलोचना हो रही है।

Contents
Aboobacker Musliyar : महिलाओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने पर कही बातAboobacker Musliyar : पहले भी विवादों में रहे हैं मुसलियारAboobacker Musliyar : राजनीतिक दलों ने जताई नाराजगीमहिलाओं की सुरक्षा पर मौलाना साजिद राशिदी का बयान, बोले- ‘जब तक देश में इस्लामी कानून लागू नहीं होगा…’महिलाओं पर मौलाना के बयान पर शाइस्ता अंबर का पलटवार, बोलीं- ‘मुस्लिम महिलाएं जज, अधिकारी और सांसद बनें’इमाम उमेर अहमद इलियासी ने कहा कि आज लड़के और लड़कियों के बीच क्षमता के आधार पर कोई भेद नहीं किया जा सकता। महिलाएं लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा साबित कर रही हैं और उन्हें कमजोर करने के बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।ये भी जानिए : India Humanitarian Aid : संकट में फिर मददगार बना भारत, राहत सामग्री से लेकर हर जरूरत का सामान भेज रहा, नेपाल बोला शुक्रिया दोस्त

मुसलियार ने एक धार्मिक संगठन की ओर से महिलाओं को पुरुषों के साथ मंच साझा नहीं करने और सार्वजनिक आयोजनों में पुरुषों के साथ दिखाई नहीं देने संबंधी निर्देश का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के लिए पर्दे की व्यवस्था के पीछे कुछ विशेष धार्मिक मान्यताएं हैं।

Aboobacker Musliyar

Aboobacker Musliyar : महिलाओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने पर कही बात

सम्मेलन में धर्मगुरु ने दावा किया कि धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर सामने आने के बजाय घर की सीमाओं में रहना चाहिए। उन्होंने पर्दे को इसी व्यवस्था का हिस्सा बताते हुए कहा कि धार्मिक विद्वान लंबे समय से इस विषय पर लोगों को जागरूक करते रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आलोचना या विरोध के बावजूद धार्मिक विद्वानों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में बोलने का अधिकार है और वे इस मुद्दे पर अपनी बात रखते रहेंगे।

Aboobacker Musliyar : पहले भी विवादों में रहे हैं मुसलियार

यह पहली बार नहीं है जब कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार के किसी बयान को लेकर विवाद सामने आया हो। वर्ष 2015 में भी उनके कथित बयान को लेकर बहस हुई थी, जिसमें स्त्री-पुरुष समानता को इस्लामी मान्यताओं के विपरीत बताए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि बाद में उन्होंने कहा था कि उनके बयान को संदर्भ से अलग करके पेश किया गया।

इसके अलावा वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन में शामिल होने को लेकर भी उनके बयान की आलोचना हुई थी। वर्ष 2025 में पुरुषों और महिलाओं के एक साथ व्यायाम करने वाले फिटनेस कार्यक्रमों को लेकर भी उन्होंने आपत्ति जताई थी।

Aboobacker Musliyar : राजनीतिक दलों ने जताई नाराजगी

मुसलियार के ताजा बयान पर केरल में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों के खिलाफ सोच बताते हुए आलोचना की है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने भी बयान को लेकर आपत्ति जताई है। फिलहाल यह बयान केरल में महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी, धार्मिक परंपराओं और लैंगिक समानता को लेकर एक नई बहस का कारण बन गया है।

महिलाओं की सुरक्षा पर मौलाना साजिद राशिदी का बयान, बोले- ‘जब तक देश में इस्लामी कानून लागू नहीं होगा…’

केरल के वरिष्ठ मुस्लिम धर्मगुरु कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार के महिलाओं को लेकर दिए बयान पर विवाद के बीच ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद राशिदी की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा कि “जब तक देश में इस्लामी कानून लागू नहीं होगा, तब तक महिलाएं सुरक्षित नहीं रहेंगी।”

मौलाना राशिदी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अबूबकर मुसलियार के सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर दिए बयान पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज है।

राशिदी के बयान ने महिलाओं की सुरक्षा, धार्मिक कानून और भारत के संवैधानिक ढांचे को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, भारत में कानून और नागरिक अधिकारों का आधार संविधान है और किसी भी धार्मिक विचार या व्यक्तिगत बयान को देश के मौजूदा संवैधानिक एवं कानूनी ढांचे के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

महिलाओं पर मौलाना के बयान पर शाइस्ता अंबर का पलटवार, बोलीं- ‘मुस्लिम महिलाएं जज, अधिकारी और सांसद बनें’

इमाम उमेर अहमद इलियासी ने कहा कि आज लड़के और लड़कियों के बीच क्षमता के आधार पर कोई भेद नहीं किया जा सकता। महिलाएं लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा साबित कर रही हैं और उन्हें कमजोर करने के बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

संपादकीय नजरिया

किसी भी धर्म और समाज की अपनी परंपराएं एवं मान्यताएं होती हैं, लेकिन जब धार्मिक विचार सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों पर सवाल खड़े करने लगें, तब उस पर स्वस्थ बहस जरूरी हो जाती है। केरल के वरिष्ठ धर्मगुरु का महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर दिया गया बयान इसी वजह से चर्चा में है। धार्मिक मान्यताओं की व्याख्या करना किसी भी व्यक्ति का अधिकार हो सकता है, लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी को सीमित करने वाली सोच पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता और गरिमा का अधिकार देता है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। समाज को ऐसे मुद्दों पर टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान जरूरी है, लेकिन इसका समाधान उनकी स्वतंत्रता सीमित करना नहीं, बल्कि सुरक्षित और समान अवसर सुनिश्चित करना होना चाहिए।

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